Monday, February 21, 2011

-: साधन सूत्र-7 :-

-: साधन सूत्र-7 :-

जीते जी अमर हो जाय

''प्रत्येक क्षण, प्रत्येक श्वांस काल रूपी अग्नि में लगातार जल रहा है। उस पर दृष्टि रख, जीवन की आशा त्याग, मरने से पहले जीते जी मर जाना चाहिए, अर्थात् जीवन तथा मृत्यु के स्वरूप में भेद मिटा देना चाहिए। ऐसा होने पर आपको अपने वास्तविक स्वरूप का बोध अवश्य होगा और ऐसा होने से यह सर्वजगत जो प्रतीत होता है, लय हो जाता है, वही आपका वास्तविक स्वरूप है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। देह में आत्मबुध्दि का त्याग होने पर जीवन और मृत्यु में भेद नहीं रहता, ऐसा अनुभव करने वाले महापुरुषों का कथन है।''


- ब्रह्मलीन संत परमपूज्य स्वामी शरणानन्द जी महाराज


Thursday, February 17, 2011

साधन सूत्र-6

-: साधन सूत्र-6 :-

"मानव की माँग"

'' मानव-जीवन की तीन विभूतियाँ हैं-
निश्चिन्तता, निर्भयता और प्रियता।
जो कुछ हो रहा है, वह मंगलमय विधान से हो रहा है-ऐसा मान लेने पर निश्चिन्तता आती है।
जो शरीर, प्राण आदि किसी भी वस्तु को अपना नहीं मानता, वह निर्भय हो जाता है।
जो 'है' वही मेरा अपना है- इसमें जिसने आस्था स्वीकार कर ली, उसी में प्रियता उदित होती है।
निश्िचिन्तता से शान्ति; निर्भयता से स्वाधीनता तथा प्रियता से रस की अभिव्यक्ति होती है। यही मानव की माँग है।''

- ब्रह्मलीन संत परमपूज्य स्वामी शरणानन्द जी महाराज

Wednesday, February 16, 2011

-: साधन सूत्र-5 :-

-: साधन सूत्र-5 :-


"एक साधक की गुरू दीक्षा"



''घर गृहस्थी का सब काम, पति तथा सन्तान की सेवा, सब प्रभु की पूजा ही तो है। कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का प्रत्येक कार्य पूजा है। बड़े प्रेम से करो। चलते फिरते जब सहज भाव से याद आ जाय तब मंत्र दुहरा लिया करो। मंत्र जाप को अपने लिये बोझ मत बनाओ।

प्रभु की सत्ता को स्वीकार करना और उनकी प्रसन्नता के लिये कर्तव्यपालन द्वारा उनकी पूजा करना- बस, इतनी सी बात है। प्रभु विश्वासी के मुँह से सुनकर प्रभु में विश्वास कर लेना ही तो गुरूभक्ति है। प्रभु विश्वास दृढ़ है तो इससे बढ़कर और कोई कर्तव्य गुरू के प्रति नहीं है। ...................... प्रभु में विश्वास रखना है और उनके बल पर अपने में विश्वास रखना है।''


- ब्रह्मलीन परमपूज्या दिव्यज्योति जी (देवकी बहन जी)

Friday, February 11, 2011

साधन सूत्र-4


-: साधन सूत्र-4 :-

"मनुष्य जीवन का गौरव''


''चाहे हम कुछ भी छोटे से छोटा काम कर रहे हों ऐसा मान कर करें कि विश्व रूपी बाटिका का एक छोटा-सा भाग, मैं भी कर रहा हूँ। हर आदमी को इस बात का गौरव हो कि चाहे मैं मजदूर हूँ तो क्या और कोई मिल-ओनर है तो क्या। मैं क्लर्क हूँ तो क्या, मैं समाज का उतना ही बड़ा प्रतिनिधि हूँ जितना कोई भी है। लेकिन आज इस बात को भूल जाते हैं और समझने लगते हैं कि मिल-ओनर समाज का बड़ा प्रतिनिधि है और मजदूर छोटा प्रतिनिधि है।''

''अरे भाई, ज़रा विचार करके देखो, आपने किसी मशीन को देखा है ? कोई पुर्जा बहुत छोटा है और कोई पुर्जा बहुत बड़ा है। छोटे से छोटे पुर्जे के बिना मशीन चलेगी क्या ? क्या राय है ? शरीर को देखो, सर सबसे ऊॅंचा रहता है और पैर सबसे नीचे। तो सर बहुत बड़ा हो गया और पैर छोटा हो गया ?''

''आज मनुष्य, मनुष्य होने में जीवन का गौरव है इस बात को भूल गया और परिस्थिति के आधार पर अपने जीवन का मूल्यांकन करने लगा। मैं बड़ा आदमी इसलिये हूँ कि मेरे पास इतना पैसा है। मैं बड़ा आदमी इसलिये हूँ कि मुझे ऐसा पद मिला है, मैं बड़ा आदमी इसलिये हूँ क्योंकि मुझमें अधिक योग्यता है।'' केवल अधिक योग्यता होने से कोई बड़ा आदमी नहीं हो जाता। ........................... तो करने वाली बात तो यह है कि तुम भी बुराई रहित हो जाओ और मैं भी बुराई रहित हो जाऊॅं। तुम अपनी सामर्थ्य के अनुसार भलाई करो, मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार भलाई करूॅं।''

''जो आपका-हमारा फर्ज है उसे पूरा कर दो। आप अपनी परिस्थिति का सदुपयोग करो, मैं अपनी परिस्थिति का सदुपयोग करूॅं।''




- ब्रह्मलीन संत परमपूज्य स्वामी शरणानन्द जी महाराज

Wednesday, February 9, 2011

-: साधन सूत्र-3 :-

"शरणागत जीवन''



"शरणागति भाव है कर्म नहीं।"


''शरणागत् विश्वासी साधक अपने सभी आत्मीय जनों को समर्थ (प्रभु) के हाथों समर्पित करके निश्चिन्त तथा निर्भय हो जाता है।''


''शरणागत् के आवश्यक कार्य प्रभु स्वयं पूरा करते हैं।''


- ब्रह्मलीन संत परमपूज्य स्वामी शरणानन्द जी महाराज


परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि शरणागत अकर्मण्य और उदासीन (Indifferent) हो जाये। उसको तो उन्हीं के आश्रित होकर निश्चिन्त भाव से अपना कर्तव्य-कर्म निष्ठा, ईमानदारी और मेहनत से अपनी पूरी योग्यता लगाकर करते रहना है।

साधन सूत्र-2

-: साधन सूत्र-2 :-

"मैं और मेरे प्रभु"



विश्वास पथ की दीक्षा

प्रभु मेरे हैं-

प्रभु से मेरा नित्य आत्मीय सम्बन्ध है। प्रभु मेरे अपने हैं-सो मुझे प्यारे लगते हैं। प्यारे की नित्य स्मृति स्वाभाविक है। प्रभु स्मृति और प्रभु प्रेम ही मेरा जीवन है।

मैं प्रभु का हूँ-

प्रभु सर्वसमर्थ, करूणावान और शरणागत् वत्सल हैं। मुझे प्रभु अपना करके जानते और मानते हैं। सो मेरे जीवन में भय और चिन्ता का कोई स्थान ही नहीं। मैं निर्भय निश्चिन्त हूँ।

प्रभु में ही मेरा नित्य निवास है-

केवल प्रभु ही हैं, उनके अतिरिक्त कोई और नहीं, कछु और नहीं। प्रभु आदिअन्त रहित हैं। वे सदैव हैं, सर्वत्र हैं। सो मैं प्रभु में हूँ और प्रभु मुझमें हैं। प्रभु सच्चिदानन्द स्वरूप हैं। सर्वत्र सदैव आनन्द ही आनन्द है। सो मैं नित्य आनन्द में हूँ।



-ब्रह्मलीन संत परमपूज्य स्वामी शरणानन्द जी महाराज

-: साधन सूत्र-1 :-

"साधन में सफलता का मंत्र"


साधन पथ में-

"हार स्वीकार मत करना।"
"आंशिक सफलता से सन्तुष्ट मत हो जाना।"
"पूर्णता से निराश मत होना।"

नोट:- तात्पर्य है कि मन में इस बात की निराशा न हो कि साधना की पूर्णता मुझे नहीं मिलेगी।


- ब्रह्मलीन संत परमपूज्य स्वामी शरणानन्द जी महाराज