-: साधन सूत्र-4 :-
"मनुष्य जीवन का गौरव''
''चाहे हम कुछ भी छोटे से छोटा काम कर रहे हों ऐसा मान कर करें कि विश्व रूपी बाटिका का एक छोटा-सा भाग, मैं भी कर रहा हूँ। हर आदमी को इस बात का गौरव हो कि चाहे मैं मजदूर हूँ तो क्या और कोई मिल-ओनर है तो क्या। मैं क्लर्क हूँ तो क्या, मैं समाज का उतना ही बड़ा प्रतिनिधि हूँ जितना कोई भी है। लेकिन आज इस बात को भूल जाते हैं और समझने लगते हैं कि मिल-ओनर समाज का बड़ा प्रतिनिधि है और मजदूर छोटा प्रतिनिधि है।''
''अरे भाई, ज़रा विचार करके देखो, आपने किसी मशीन को देखा है ? कोई पुर्जा बहुत छोटा है और कोई पुर्जा बहुत बड़ा है। छोटे से छोटे पुर्जे के बिना मशीन चलेगी क्या ? क्या राय है ? शरीर को देखो, सर सबसे ऊॅंचा रहता है और पैर सबसे नीचे। तो सर बहुत बड़ा हो गया और पैर छोटा हो गया ?''
''आज मनुष्य, मनुष्य होने में जीवन का गौरव है इस बात को भूल गया और परिस्थिति के आधार पर अपने जीवन का मूल्यांकन करने लगा। मैं बड़ा आदमी इसलिये हूँ कि मेरे पास इतना पैसा है। मैं बड़ा आदमी इसलिये हूँ कि मुझे ऐसा पद मिला है, मैं बड़ा आदमी इसलिये हूँ क्योंकि मुझमें अधिक योग्यता है।'' केवल अधिक योग्यता होने से कोई बड़ा आदमी नहीं हो जाता। ........................... तो करने वाली बात तो यह है कि तुम भी बुराई रहित हो जाओ और मैं भी बुराई रहित हो जाऊॅं। तुम अपनी सामर्थ्य के अनुसार भलाई करो, मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार भलाई करूॅं।''
''जो आपका-हमारा फर्ज है उसे पूरा कर दो। आप अपनी परिस्थिति का सदुपयोग करो, मैं अपनी परिस्थिति का सदुपयोग करूॅं।''
- ब्रह्मलीन संत परमपूज्य स्वामी शरणानन्द जी महाराज
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