-: साधन सूत्र-14 :-
मानव जीवन में गुण-दोष
स्वभावत: कोई भी व्यक्ति अपने को अपनी दृष्टि में भला ही देखना चाहता है। पर भलाई करके तो हम भले होते नहीं- भले होते हैं अपने जीवन में से जानी हुई बुराइयों (दोषों) का त्याग करने से। अपने जीवन में से जानी हुई बुराइयों को निकाल देने पर भला बनने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता हम स्वत: भले बन जाते हैं। निर्दोषता में हमारे व्यक्तित्व में गुणों की अभिव्यक्ति होती है परन्तु उनका अभिमान भी नहीं रखना है।
इसीलिए मानव सेवा संघ के नियम संख्या-1 में ''आत्मनिरीक्षण अर्थात् प्राप्त विवेक के प्रकाश में अपने दोषों को देखने की बात कही गयी है और नियम संख्या-2 में ''की हुई भूल (बुराई कहे, दोष कहें) को पुन: न दोहराने का व्रत लेकर सरल विश्वास पूर्वक प्रार्थना करना'' के लिए कहा गया है। इसमें यह अर्थ निहित है कि यदि हम अपनी जानी हुई भूल (दोष-बुराई) को मिटाने/छोड़ने में अपने को असमर्थ पाते हैं तो व्यथित होकर ईश्वर का आश्रय स्वीकार करें।
प्रश्न् उठता है कि जिसकी इतनी चर्चा की गई है वह बुराई (दोष या भूल कहें) वास्तव में है क्या और जो जीवन से जानी हुई बुराई निकालने की बात कही गयी है वह कैसे सम्भव है। मानव सेवा संघ की पुस्तक 'चितशुध्दि' के निम्नलिखित उध्दरण से इस प्रश्न का सरल और स्पष्ट उत्तर मिल जाता है।
''अब विचार करना है कि गुण क्या है और दोष क्या है? दूसरों की ओर से अपने प्रति होने वाले दोष का ज्ञान स्वत: हो जाता है और दूसरों से हम वही आशा करते हैं जो गुण है। कोई भी अपना अनादर, हानि-क्षति नहीं चाहता। सभी आदर, प्यार और रक्षा चाहते हैं। जिन प्रवृत्तियों से किसी की क्षति हो, किसी का अनादर हो, किसी का अहित हो, वे सभी दोष हैं और जिन प्रवृत्तियों से दूसरों का हित, लाभ एवं प्रसन्नता हो वे सभी गुण हैं।''
''गुणों का उपयोग दूसरों के प्रति होता है और उससे अपना विकास स्वत: हो जाता है। जिन प्रवृत्तियों से दूसरों का अहित होता है उन प्रवृत्तियों से अपना भी अकल्याण ही होता है। यह रहस्य जान लेने पर दूसरों के अहित की कामना सदा के लिए मिट जाती है और सर्वहितकारी भावना स्वत: जागृत होती है।''
''सर्व-हितकारी भावना की भूमि में ही गुण विकास पाते हैं। जो किसी का बुरा नहीं चाहता उसके सभी दोष स्वत: मिट जाते हैं। एक ही दोष स्थान भेद से भिन्न-भिन्न प्रकार का भासता है। सर्वांश में किसी भी दोष के मिट जाने पर सभी दोष मिट जाते हैं और सर्वांश में किसी भी गुण के अपना लेने पर सभी गुण स्वत: आ जाते हैं। इस दृष्टि से दोषों की निवृत्ति और सद्गुणों की अभिव्यक्ति युगपद् (automatic and simultaneous) है।''
''सर्वांश में गुणों की अभिव्यक्ति होने पर निरभिमानता आ जाती है क्योंकि दोषों की उत्पत्ति नहीं होती और गुणों से अभिन्नता (identity) हो जाती है। यह नियम है कि जिससे अभिन्नता हो जाती है, उसका भास नहीं होता, अर्थात् उसमें अह्मबुध्दि नहीं होती अपितु वह जीवन हो जाता है।''
उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि गुण-दोष क्या है और दोषों की निवृत्ति और गुणों की अभिव्यक्ति किस प्रकार सम्भव है। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि हमें अपने को अपनी दृष्टि में तौलना है न कि इस आधार पर कि हमें लोग कैसा समझते हैं। ''हमें कोई बुरा न समझे इससे हम भले हो नहीं जाते, भले तो बुराई के त्याग से ही हो सकते हैं।''
ऐसा तर्क कोई प्रस्तुत कर सकता है कि हमें भले बनने की क्या जरूरत है हम जैसे हैं वैसे ही ठीक हैं। परन्तु ऐसा वही कह सकता है जिसकी जीवन बृध्दि विकारों और वासनाओं में ही है और जीवन का कोई लक्ष्य ही नहीं है। जिसके जीवन में लक्ष्य वास्तविक मांग परम शांति, परमस्वाधीनता और परम प्रियता की है वह ऐसा नहीं कहेगा क्योंकि वह जानता है कि इनकी प्राप्ति निर्दोषता के बिना नहीं हो सकती।
अपने को बुराई रहित बनाना अर्थात् हम किसी को बुरा न समझें, किसी का बुरा न चाहें और किसी के प्रति बुराई न करें, सहज हो जाता है, यदि यह ध्यान बना रहे कि भौतिकवादी की दृष्टि से जो जगत की ही सत्ता मानते हैं, जगत के नाते हम सब एक है, अध्यात्मवादी की दृष्टि से सभी परमात्मा के अंश हैं और ईश्वरवादी की दृष्टि से सभी उसी के रूप हैं।
मानव सेवा संघ के प्रणेता क्रान्तदर्शी ब्रह्मनिष्ठ संत स्वामी शरणानन्द जी का शरीर छोड़ते समय अन्तिम उद्धोष था-
''कोई और नहीं कोई गैर नहीं''
-ब्रह्मलीन संत स्वामी शरणानन्द जी महाराज द्वारा प्रणीत मानव सेवा संघ की पुस्तक ''चित्त शुध्दि'' पर आधारित एवं उध्दरित।
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