-: साधन सूत्र-16 :-
साधन-पथ के लिए टार्च
साधन-पथ पर चलने के इच्छुक एक जिज्ञासु ने (ब्रह्मलीन संत) स्वामी शरणानन्द जी से कुछ प्रश्न् किये स्वामी जी ने उसका समाधान निम्नलिखित ढंग से किया:-
प्रश्न्: स्वामी जी! कोई कहते हैं गीता पढ़ो, कोई कहते हैं रामायण पढ़ो, कोई कहते हैं मंदिर जाओ, जप करो, यज्ञ करो, दान दो तप करो। समझ में नहीं आता क्या करें। कृपया आप बतलाइये क्या करूॅं।
स्वामी जी ने जो उत्तर दिया-
उत्तर: जानी हुई बुराई छोड़ दो।
प्रश्न्: बुराई को छोड़ने के बाद क्या करूॅं?
उत्तर: सबके प्रति सद्भाव रखो और यथाशक्ति क्रियात्मक सहयोग दो।
प्रश्न्: महाराज जी! इसके बाद क्या करूॅं?
उत्तर: सद्भाव और सहयोग के बदले में किसी से कुछ मत चाहो, न अभी, न कभी।
प्रश्न्: फिर इसके बाद क्या करूॅं?
उत्तर: पहले ये तीन कर लो, चौथी बात स्वयं मालूम हो जायेगी।
प्रश्न्: स्वत: ही?
उत्तर: हाँ स्वत: ही। अरे तुम यह क्यों चाहते हो कि हम यहाँ से तुम्हारे घर तक बिजली के खम्भे लगा दें। इतनी मेहनत मत करवाओ यार। अरे भइया, हमने तुम्हें टॉर्च दे दी है, आगे स्वत: मार्ग मिल जायेगा। अगर तुम केवल पहली बात कर लो अर्थात् 'जानी हुई बुराई को छोड़ दो' तो तुम्हे सब कुछ मिलेगा। शांति, मुक्ति, भक्ति। इससे जीवन बुराई रहित होगा तो स्वत: ही सारे काम होंगे।
नोट: स्वामी जी का परम्परागत पूजा पाठ आदि के प्रति न विरोध था, न आग्र्रह। उनका कथन था कि 2 घंटे साधन और शेष घंटे असाधन तो इससे जीवन के लक्ष्य अथवा मांग कहे, उसकी तो प्राप्ति नहीं होगी। वास्तविक जीवन की प्राप्ति तो तभी होगी जब हमारा पूरा जीवन साधनमय हो जाय। एक अन्य प्रश्नकर्ता का प्रश्न् और स्वामी जी का उत्तर यहाँ प्रासंगिक है-
प्रश्न्: मैं प्रतिदिन दो घंटे परम्परागत ढंग से पूजा करता हूँ और घरवाले उसका विरोध करते हैं तथा उसमें बाधा डालते हैं। क्या किया जाय?
उत्तर: पूजा का वास्तविक अर्थ है-भगवान के नाते और उन्हीं की प्रसन्नता के लिए संसार की सेवा करना। जिस समय घरवाले आपसे किसी काम की अपेक्षा करते हों और आप उसी समय पूजा में बैठ जाते हों तो उनका विरोध करना उचित ही है। अत: पूजा के वास्तविक अर्थ को अपनाकर घरवालों की निष्काम भाव से सेवा करें। यदि विधिवत् पूजा करने का राग ही है तो उसका समय जरूरी कार्य करने के पहले या बाद में रख सकते हैं।
नोट: विधिवत् पूजा भी तब ही सार्थक होगी जब वह मात्र क्रिया न रह जाये और अहं पुष्ट हो कि मैंने इतनी देर पूजा किया, इतना जप किया, इतनी बार घन्टा और शंख बजाया आदि और इससे किसी फल की कामना हो जैसे, व्यापार खूब बढ़े, मुकदमे में जीत हो जाये आदि। इस प्रकार तो जिसकी पूजा कर रहे हैं वह साध्य न होकर साधन हो गये।
विधियात्मक पूजा करे तो जिसकी पूजा कर रहे हैं उसकी प्रसन्नता के लिए और लोकहित के भाव से। तब सभी क्रियायें साध्य की प्रसन्नता के लिए हो जायेंगी-फूल चढ़ाना, भोग लगाना, घंटा-शंख बजाना सबके पीछे भाव होगा कि इससे उन्हें अच्छा लगेगा। इस भाव से उनके प्रति प्रीति उदय होगी और अपने को भी प्रसन्नता और प्रीति का रस मिलेगा।
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