Tuesday, February 22, 2011

-: साधन सूत्र-10 :-

-: साधन सूत्र-10 :-

प्रभु के नाते की हुई हर प्रवृत्ति पूजा-भक्ति है।

“ईश्वर सबमें हैं।-मैं जो कुछ भी करता हूँ उस सबको ईश्वर देखते हैं।-जो ऐसा अनुभव करता है, उसका प्रत्येक व्यवहार भक्तिमय बनता है।“

“जिसका व्यवहार शुध्द है, वह जहाँ बैठा है वहीं भक्ति करता है और वहीं उसका मन्दिर है। व्यवहार और भक्ति में बहुत अन्तर नहीं है। अमुक समय भक्ति का और अमुक समय व्यवहार का, ऐसा विभाजन नहीं है।“

“बहुत से लौकिक कार्यों से विश्राम लेने के बाद जो भी समय मिले, उसमें भक्ति करना मर्यादा भक्ति कही जाती है।..... परन्तु पुष्टि भक्ति में व्यवहार और भक्ति अलग-अलग नहीं होते। एक ही होते हैं।...... प्रत्येक कार्य में ईश्वर का अनुसंधान, इसे कहते हैं पुष्टि भक्ति।“

“केवल अपने लिये ही कार्य करो यह पाप है। घर के मनुष्यों के लिये काम करो, यह व्यवहार है और परमात्मा के लिये काम करो, यह भक्ति है। कार्य तो एक ही, परन्तु इसके पीछे भावना में बहुत फर्क है। महत्व क्रिया का नहीं, क्रिया के पीछे हेतु क्या है, भावना क्या है- यह महत्वपूर्ण है।“

“भक्ति के लिये प्रवृत्तियों का निरन्तर त्याग करने की आवश्यकता नहीं है। प्रवृत्तियों को सतत् भक्ति बनाओ।...... अपने प्रत्येक प्रवृत्ति को भक्तिमय बनाओ।“


धंधा करने में ईश्वर को भूलों नहीं, तो तुम्हारा धंधा ही भक्ति बन जायेगा।...... कोई कोई वैष्णव दुकान में श्री द्वारिकानाथ जी का चित्र पधराते हैं, यह ठीक है, परन्तु द्वारिकानाथ सदा हाज़िर हैं, ऐसा समझ कर व्यवहार करे, यह बहुत जरूरी है। जब तक देह का भान है, तब तक व्यवहार तो करना ही पड़ेगा। व्यवहार करो परन्तु व्यवहार करते करते, परमात्मा सबमें विराजते हैं, यह मत भूलो। व्यवहार में अपने धर्म को मत छोड़ो।“............

“जब तक यह देहाभिमान है (मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, मैं पुरूष या स्त्री हूँ) जब तक आत्मस्वरूप का ज्ञान हुआ नहीं है, तब तक धर्म की बहुत ज़रूरत है।“

“भक्ति भी धर्म की मर्यादा में रहकर करो।........ स्वधर्म का पालन करो।....... सनातन धर्म का दर्शन करना हो तो तुम रामजी का दर्शन करो। राम के चरित्र का मनन करो।....... सनातन धर्म ईश्वर का स्वरूप है। धर्म साधन भी है और साध्य भी है।....... सनातन धर्म रामजी का स्वरूप है।...... रामजी की सेवा से ही शान्ति मिलती है। रामजी का एक एक गुण जीवन में उतारना, यही रामजी की उत्तम सेवा है। रामजी की सेवा अर्थात् रामजी की मर्यादा का पालन करना।“

“श्री रामजी में समस्त गुण एकत्रित हुये हैं। श्री राम अर्थात् जगत के समस्त दिव्य सद्गुणों के भण्डार, यही तो श्रीराम हैं। राम की मातृपितृ भक्ति, राम जी का बन्धु-प्रेम, राम जी का संयम, रामजी का सदाचार, रामजी की सरलता, रामजी का एक पत्नीव्रत, रामजी का एक वचन, रामजी की उदारता, रामजी की शरणागत वत्सलता, रामजी का विनय, रामजी की मधुर वाणी आदि सभी दिव्य सद्गुण रामजी में एकत्रित हुये हैं।“

-- श्रीमद्भागवत के प्रकाण्ड विद्वान एवं व्यास ब्रह्मलीन संत श्री रामचन्द्र डोंगरे जी महाराज द्वारा 'कल्याण' के रामभक्ति अंक में प्रकाशित-'राम जी की सेवा' से उध्दरित।





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