Wednesday, February 9, 2011

-: साधन सूत्र-3 :-

"शरणागत जीवन''



"शरणागति भाव है कर्म नहीं।"


''शरणागत् विश्वासी साधक अपने सभी आत्मीय जनों को समर्थ (प्रभु) के हाथों समर्पित करके निश्चिन्त तथा निर्भय हो जाता है।''


''शरणागत् के आवश्यक कार्य प्रभु स्वयं पूरा करते हैं।''


- ब्रह्मलीन संत परमपूज्य स्वामी शरणानन्द जी महाराज


परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि शरणागत अकर्मण्य और उदासीन (Indifferent) हो जाये। उसको तो उन्हीं के आश्रित होकर निश्चिन्त भाव से अपना कर्तव्य-कर्म निष्ठा, ईमानदारी और मेहनत से अपनी पूरी योग्यता लगाकर करते रहना है।

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