Friday, February 25, 2011

-: साधन सूत्र-15 :-

-: साधन सूत्र-15 :-

साधक-साधन और साध्य

जो साध्य से दूरी, भेद और भिन्नता को मिटा दे, उसे साधन कहते हैं।

उदारता, असंगता प्रियता साधन के अर्थ में आते हैं। हर समय प्यारे प्रभु की याद बनी रहे, यही भक्ति पथ की साधना है। हर समय अपने स्वरूप की याद बनी रहे, यही मुक्ति पथ की साधना है हर समय अपने कर्तव्य की याद बनी रहे, यही कर्तव्य-पथ की साधना है।

ज्ञानपूर्वक यह अनुभव करने से कि मैं शरीर नहीं हूँ, अथवा शरीर मेरा नहीं है-देह से तादात्मय का नाश हो जाता है। सेवा करने से स्थूल शरीर से, इच्छा रहित होने से सूक्ष्म शरीर से और अप्रयत्न होने से कारण शरीर से असंगता प्राप्त होती है।

मानव का पुरुषार्थ केवल सत्संग करने में है। सत्संग का अर्थ है- अपने जाने हुये सत्य को स्वीकार करना, ज्ञान के आधार पर अकिंचन या अचाह होकर अप्रयत्न हो जाना सत्संग है। आस्था के आधार पर सुने हुए प्रभु के अस्तित्व, महत्व एवं अपनत्व को स्वीकार करके निश्चिन्त तथा निर्भय हो जाना सत्संग है। ज्ञान के आधार पर किये हुए सत्संग का फल 'साधन' है और आस्था के आधार पर किये हुए सत्संग का फल 'भजन' है।

''मानव किसी आकृति विशेष का नाम नहीं है। जो प्राणी अपनी निर्बलता एवं दोषों को देखने और उन्हें निवृत करने में समर्थ है, वही वास्तव में 'मानव' कहा जा सकता है।''

''मानव मात्र जन्मजात साधक है। (अतएव 'मानव' का ही नाम 'साधक' है। साधक का कोई साध्य होता है) अत: उसे साधन रूपी निधि से सम्पन्न होना अनिवार्य है। मानव उसे नहीं कहते जिसकी कोई मांग नहीं और जिस पर कोई दायित्व नहीं। मिले हुए शरीर का नाम मानव रखना भूल है; कारण कि शरीर कर्म सामग्री है और कुछ नहीं।''

''मैं हूँ यह स्वीकृति मानव मात्र की मूल स्वीकृति है। मैं क्यों हॅूं इस सम्बन्ध में अनेक मत भले ही हो, पर मैं हॅूं और मुझमें ही मांग है, इस में दो मत नहीं हैं और यह मानव मात्र को स्वीकार है।

-ब्रह्मलीन संत स्वामी श्री शरणानन्द जी महाराज

नोट:- मैं शरीर नही हॅूं और शरीर मेरा नही है। शरीर, परिवार सब समाज सहित संसार के अंग हैं। मानव का स्वरूप है सेवा, त्याग प्रेम, सो शरीर की भी सेवा करनी है और शरीर के द्वारा परिवार और संसार की भी यथाशक्ति क्रियात्मक और भावात्मक सेवा करनी है।

शरीर की सेवा के सम्बन्ध मे मानव सेवा संघ का नियम संख्या 8 और 9 मार्ग दर्शक है:-

नियम संख्या 8-शारीरिक हित की दृष्टि से आहार-विहार में संयम और दैनिक कार्यों में स्वावलम्बन।

नियम संख्या 9-शरीर श्रमी, मन संयमी, बुध्दि विवेकवती, हृदय अनुरागी और अहं को अभिमान शून्य करके अपने को सुन्दर बनाना।

ऊपर जो शब्द अकिंचन, अचाह और अप्रयत्न आये हैं उनमें अकिंचन का तात्पर्य है मेरा कुछ नहीं है और मेरे लिये नहीं है अर्थात् 'मैं' के लिए नहीं है वह संसार कहे प्रकृति कहें या ईश्वर कहें के द्वारा दी हुई सेवा सामग्री है।

अचाह का तात्पर्य है मुझे अर्थात् 'मैं' को कुछ नहीं चाहिए । 'मैं' को तो चाहिये या यों कहें कि उसमें मांग है परम-शांति, परम स्वाधीनता और परम प्रियता की-रसरूप अविनाशी जीवन की।

अप्रयत्न का तात्पर्य है कि जब मुझे अर्थात् 'मैं' को कुछ चाहिए ही नहीं तो अपने लिये कुछ प्रयत्न ही नहीं करना है। कारण की उसे जो चाहिए वह 'स्व' के द्वारा प्राप्त होता है, उसमें श्रम अपेक्षित नहीं है।

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