Friday, February 25, 2011

-: साधन सूत्र-13 :-

-: साधन सूत्र-13 :-

सन्यास का अर्थ

ब्रह्मलीन संत स्वामी श्री शरणानन्द जी महाराज को उद्बोधन है कि ''ममता कामना और तादातम्य के त्याग का नाम ही सन्यास है। कपड़े रंगना और किसी सम्प्रदाय विशेष में दीक्षा लेना तो सन्यास का बाहरी चिन्ह है। केवल बाह्य चिन्ह धारण करने से किसी की मुक्ति नहीं होती। ''
''सही करना, कुछ न चाहना और प्रभु के शरणागत होना, यह योग, बोध-प्रेम की तैयारी है और इसी से योग-बोध-प्रेम की प्राप्ति होती है।''
''जगत् से सम्बन्ध टूटकर उस अनन्त के साथ अहं का सम्बन्ध जुड़ जाने का नाम ही 'योग' है। इसी से सब संकल्पों की निवृत्ति होती है। और उस अनन्त को सब जगह सब में देखना ही 'बोध' है। योग से दोष और कामनाओं का त्याग होता है और उस अनन्त को अपना मानना एवं अहं को उनके समर्पित करना ही प्रेम है, यानी प्रेम की प्राप्ति होती है। केवल गृह त्याग करने एवं वस्त्र रंगने मात्र से किसी को योग-बोध प्रेम की प्राप्ति नहीं हो सकती। यह त्याग नहीं वरन् त्याग के भेष में अपने कर्तव्य से पलायन करना है।''

एक प्रश्न् कि साधु माने क्या का स्वामी शरणानन्द जी ने व्याख्या निम्नलिखित रूप में किया जो इस क्रम में प्रासंगिक है :
प्रश्न्: साधु माने क्या ?
उत्तर: साधु संसार के बाहर चले तो नहीं जाते, संसार से सम्बन्ध अवश्य तोड़ देते हैं। शरीर को गंगा में तो नहीं फेंक देते। शरीर से सम्बन्ध अवश्य तोड़ देते हैं। साधु माने यही कि जो संसार से सम्बन्ध तोड़ दे, चाहे घर में रह कर, चाहे वन में जाकर। साधु वह, जो किसी को हानि न पहुँचाये। जो प्रभु को पसन्द करे। तुम मानव हो, प्रसन्नतापूर्वक रहो, दु:खी मत रहो, खिन्न मत रहो, व्यर्थ चिन्तन मत करो, थोड़े दिन का मेला है-सदा नहीं रहेगा।
मानव सेवा संघ ने प्रकाश दिया है- हे मानव! भेष के साधु सब नहीं हो सकते लेकिन बिना भेष के साधु हर भाई, हर बहिन हो सकती है।
किसी को हानि मत पहुँचाओ। किसी को बुरा मत समझो और यथाशक्ति जिस परिवार में, जिस समाज में रहते हो उसके काम आओ। क्या यह जीवन सबको नहीं मिल सकता ? मिल सकता है। तो साधु माने साधक है क्योंकि-
(1) हमें संसार की सेवा करना है।
(2) हमें प्रभु का प्रेमी होना है।
(3) हमें अचाह होना है।


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