-: साधन सूत्र-38 :-
व्यापार-साधक की दृष्टि में
मानव सेवा संघ के वार्षिक सत्संग समारोह में वृन्दावन आश्रम गया था। उसी समय भारत में क्रिकेट वर्ल्ड-कप के मैच हो रहे थे। मैच के परिणाम को लेकर सट्टा (betting) बड़े जोरो पर था। वार्तालाप में एक सज्जन ने बताया कि उनके बेटे कह रहे थे कि एक लाख रुपया लगा दिया जाय,दस लाख मिल जायेगा। परन्तु उन्होंने रुपया डूब जाने के भय से सट्टा (betting) में नहीं लगाया। अनायास मैं पास के कमरे में गया,आलमारी में मानव सेवा संघ की पुस्तकें लगी थीं-मंत्रवत् एक पुस्तक उठा लिया और उसे बीच से खोला। उस पेज पर जो लिखा था,उसको पढ़कर आश्चर्य-चकित रह गया-एक मिनट पहले जिस विषय पर हम लोग चर्चा कर रहे थे,उसी का समाधान था।
अवश्य ही कोई अदृश्य शक्ति मुझे प्रेरित करके उस पुस्तक तक ले गई और वह पृष्ठ खुलवाया। पुस्तक का नाम था-'एक महात्मा का प्रसाद' जो गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित हुई थी । अब यथावश्यक संशोधन के साथ मानव सेवा संघ द्वारा 'संत -सौरभ' के नाम से प्रकाशित है। उसका उध्दरण नीचे प्रस्तुत है:-
''मनुष्य को जो सुख किसी के दु:ख से मिलता है,वह ठीक नहीं है; क्योंकि जिसका जन्म किसी के दु:ख से होता है,उसका फल भी दु:ख होगा। आम के बीज का फल आम ही होगा और बबूल के बीज का फल काँटा होगा।"
''व्यापार के दो रूप होते हैं। एक तो वह सट्टे का व्यापार है जिसमें जुए की भाँति किसी एक का नुकसान ही दूसरे का लाभ होता है। इस बात को सभी जानते हैं कि सट्टे में धन बाहर से नहीं आता। सट्टा करने वालों में ही एक का नुकसान और दूसरे का लाभ होता है। सट्टा करने वाले सभी लाभ की आशा से करते हैं,परन्तु सबको लाभ नहीं हो सकता। इस व्यापार में किसी का दु:ख ही,दूसरे का सुख है, अत: यह व्यापार उचित नहीं है।"
''दूसरा व्यापार वह है जिसमें समाज की आवश्यकता पूरी करने के लिए वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है,जहाँ वस्तुएँ अधिक होती है,वहाँ से उस जगह पहुँचायी जाती है,जहाँ उसकी आवश्यकता होती है। इस प्रकार जो व्यापार समाज की आवश्यकता पूरी करने के लिए किया जाता है,उसमें किसी का नुकसान नहीं होता। श्रम करने वाले से लेकर भोक्ता तक सभी को सुख मिलता है। और व्यापारी को भी उसके परिश्रम के बदले में धन मिल जाता है। यह व्यापार ठीक है।"
नोट: जुआ,द्युत-क्रीड़ा,रेस आदि प्रथम श्रेणी में ही आते हैं। जमाखोरी (hoarding) भी एक प्रकार का सट्टा ही है।
अधिकांश लोग सुप्रसिध्द भक्त एवं साहित्यकार सुदर्शन सिंह चक्र जी के नाम से परिचित होंगे। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होने वाले 'कल्याण' ग्रन्थ में उनके लेख छपा करते थे। वे ही ब्रह्मनिष्ठ संत स्वामी शरणानन्द जी से अनेक अवसरों पर मिलते थे और उनसे जो सत्चर्चा होती थी, उसे 'कल्याण' के अंकों में 'एक महात्मा का प्रसाद' शीर्षक से छपवाते थे। बाद में उन्हीं लेखों का संकलन करके पुस्तक का रूप दे दिया गया।
जिस काल की यह बात है उस समय आज जैसा भयंकर भोग-वाद और धन का महत्व नहीं था। व्यापारी लोग अपनी जीविका हेतु यथोचित (reasonable) मुनाफा (profit) लेते थे और उसी में सन्तुष्ट रहते थे। परन्तु आज कल तो धन और भोग के महत्व ने जीवन में इतना विकराल रूप ले लिया है कि लाभ (profit) के प्रतिशत (percentage) की कोई सीमा ही नहीं रह गई है। उत्पाद-मूल्य (cost of production) और विक्रय मूल्य (sale price) में कोई सह-सम्बन्ध (correlation) ही नहीं है। पाँच रुपये की दवा फुटकर विक्रेता के यहाँ पचपन की, सवा दो हजार का इन्जेक्शन सवा पाँच हजार का मिलता है। यही दशा अन्य क्षेत्रों में भी है। रातों रात (overnight) धनाढय (rich) होने और ऐशो-आराम की सभी वस्तुओं को जल्द से जल्द हथियाने (grab) की इस कोटि की चाह-तृष्णा हो गई है कि उन्हें इस बात की ग्लानि ही नहीं होती कि मरीजों का, उपभोक्ताओं का भयंकर शोषण कर रहे हैं। धन और वस्तुओं में ही जीवन बुध्दि हो गई है।
संत ने दूसरे प्रकार के व्यापार जिसको ठीक बताया था वह अब ठीक कहाँ रहा? अब तो उसका भी वही विकृत रूप हो गया जिसमें एक का लाभ दूसरे की हानि और दु:ख है। चौतरफा लूट मची हुई है। जब दूसरों के प्रति कोई संवेदना ही नहीं है,उसके दु:ख और मजबूरी का एहसास ही नहीं है,ऑंखों पर लोभ का चश्मा लगा लिया है तो यही कहना पड़ेगा कि 'मानवता' और 'इन्सानियत'-ये शब्द अब शब्द-कोष से बाहर कर दिये गये हैं।
यहाँ ऐसे व्यापार की चर्चा नहीं की जा रही है जिसमें नकली दवाइयाँ नकली दूध,चर्बी का मिलावटी देशी घी,अनेक मिलावटी खाद्य पदार्थ आदि धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं। वह तो व्यापार है ही नहीं-वह तो सीधा जघन्य अपराध है।
अनुचित और अन्यायपूर्ण ढंग से जो भी धन-सम्पत्ति बटोरी जाती है वह किसी की हानि और दु:ख ही होता है।
यह चर्चा साधकों को दृष्टि में रखकर की जा रही है। साधक का स्वरूप ही है सेवा-त्याग-प्रेम और उनके जीवन में मांग है शान्ति,स्वाधीनता और प्रियता की।
मानव सेवा संघ का दर्शन कहता है कि उस सुख का त्याग कर दो जो किसी का दु:ख हो। अत: यदि अपने को साधक स्वीकार किया है तो उध्दरित संत-वाणी के प्रकाश में दृढ़ व्रत लेना होगा कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए,सबके प्रति सौहार्द,संवेदनशीलता और सेवा के भाव से ही कोई भी व्यापार/व्यवसाय करेंगे और इस बात के लिए सजग रहेगे कि मैं जो कर रहा हूँ वह किसी को अनुचित (undeserved and unjust) हानि या दु:ख तो नहीं पहुँचा रहा है। जो उचित और न्यायपूर्ण लाभ होगा वही अर्जन करुँगा-किसी की मजबूरी का लाभ उठाकर उसका शोषण नहीं करुँगा। न्यायोचित ढंग से जो मिल जायेगा उसी में सन्तुष्ट और प्रसन्न रहूँगा। स्वामी शरणानन्द जी का कथन है कि- ''अपने को सुन्दर बनाओ, सुन्दर समाज का निर्माण स्वत: होगा।
अत:यदि हमें सुन्दर समाज की लालसा है,तो हम में से हर एक को अपने जीवन में क्रांति लाना होगा और हर इन्सान को अपने जैसा ही इन्सान समझना होगा और उसके प्रति इन्सानियत का दृष्टिकोण और व्यवहार अपनाना होगा। जब हम हर व्यक्ति को अपने जैसा ही इन्सान समझेंगे तब हम दूसरों के प्रति वह नहीं करेंगे जो हम अपने प्रति नहीं किया जाना चाहते-और यही इन्सानियत है।
महात्मा गाँधी ने एक बहुत ही मार्मिक बात कहा था- ''यह मत भूलो कि जो व्यक्ति अपने सिर पर तुम्हारा मैला ढोता है,वह भी तुम्हारी ही तरह एक इन्सान है।"
Where can I get these books (Sadhan Sutra ) from ?
ReplyDelete