Saturday, May 21, 2011

-: साधन सूत्र-44 :-

-: साधन सूत्र-44 :-

क्‍या ईश्‍वर केवल माना ही जा सकता है,
 जाना नहीं जा सकता



इस प्रश्न् का उत्तर परम कोटि के ब्रह्मनिष्ठ प्रज्ञा-चक्षु संत स्वामी शरणानन्द जी से प्राप्त हुआ। परन्तु यह प्रश्न् कैसे उत्पन्न हुआ और किस प्रकार इसका उत्तर मिला इसकी पृष्टिभूमि का वर्णन से इसे समझना सहज होगा।

सर्वप्रथम स्वामी जी का दर्शन का सौभाग्य वर्ष 1955 के दिसम्बर माह में गाजीपुर में अपनी ससुराल में प्राप्त हुआ। उस समय दूसरे की निर्बलता को अपना बल न मानना और प्राप्त बल का दुरुपयोग न करना-विषय पर चर्चा हो रही थी।

जब मेरी पत्नी 5-7 वर्ष की थी तब से उनका और उनके माता पिता-पूरे परिवार का स्वामी जी से बहुत आत्मीय सम्बन्ध था। विवाह के पश्चात् इन्हीं लोगों के माध्यम से स्वामी जी के निकट आने का अवसर और सौभाग्य प्राप्त होता रहा। सेवा काल में जब-जब सम्भव हुआ हम लोग उनके द्वारा स्थापित मानव सेवा संघ आश्रम वृन्दावन जाते रहे।

विद्यार्थी जीवन में मेरे एक मित्र दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी थे। उनसे सुना  था  कि  पूरे  ब्रह्माण्ड  में  एक  कल्पित  तत्व (hypothetical substance) जिसे ईथर (ether) कहा जाता है, व्याप्त है। उसी में तीव्र कम्पन हुआ जिससे सारी सृष्टि की उत्पत्ति हुई।

बचपन से ही ईश्वर के विभिन्न रूपों से परिचय तो था ही और संस्कार के रूप में आस्था भी मिली कि ईश्वर है और कृपालु और दयालु हैं।

परन्तु बड़े होने पर जिज्ञासु बुध्दि (inquisitive mind) से सोच बनने लगा कि ईश्वर कैसे है, क्या हैं, कहाँ से आये आदि। एक बार 1965 के जुलाई माह में लखनऊ में सत्संग चल रहा था तो मैं भी आफिस के बाद रोज वहाँ जाता था। स्वामी जी एकान्त में लेटे थे। मैंने उनके पास जाकर विश्वविद्यालय के अपने मित्र द्वारा बतलाई हुई बात का उल्लेख करते हुए पूछा कि यदि ऐसा है तो ईश्वर में करुणा, कृपालुता और दया कैसे और कहाँ से आई? (ईथर की बात सुनकर मेरे मन में प्रश्न् उठा था कि ईथर तो जड़ होगा, फिर उसमें चेतना कैसे होगी)।

स्वामी जी ने मात्र एक प्रश्न् के रूप में उत्तर दिया कि ये सब तुम्हारे में कहाँ से आये। उनकी उत्तर देने की शैली यही थी। खुलासा बहुत कम करते थे,छोटे सूत्र में ही उत्तर देते थे। बाद में मुझे इस शैली का रहस्य समझ में आया-यदि खुलासा कर दिया जाय तब विषय पर वहीं विराम लग जाता है,पर यदि सूत्र में उत्तर मिलेगा तब उसका अर्थ समझने और पकड़ने के लिए अपनी ओर से उस पर मनन-चिन्तन होता रहेगा।

और  यही  प्रक्रिया मष्तिष्क में चलने  लगी ।  वर्ष  1966 के जाड़ों में बहराइच,बलरामपुर आदि स्थानों में सत्संग का कार्यक्रम था जिसमें हम लोग भी सम्मिलित हुए। अन्त में गोण्डा रेलवे स्टेशन पर हम लोग स्वामी जी के साथ टे्रन की इन्तजार में खड़े थे। उन्हें मुजफ्फरपुर जाना था। कई लोगों से बातचीत कर रहे थे। मैं बगल में खड़ा था। उन्होंने अनायास पूछा 'क्या तुमको ईश्वर में विश्वास है'? मेरा उत्तर था-स्वामी जी खिचड़ी वाला है। उन्होंने बड़े स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरा और बोले- हो जायेगा।

इसी पृष्टभूमि में मैंने कुछ वर्ष पश्चात् लखनऊ में सत्संग के अवसर पर  स्वामी  जी से  पूछा कि 'क्या ईश्वर केवल माना ही जा सकता है, जाना नहीं जा सकता''।

उन्होंने विस्तार से समझाया और उनके पश्चात् देवकी बहन जी के प्रवचन का यही विषय रहा। और सब बातें तो भूल गईं,परन्तु मूल याद रहा। उनहोंने कहा कि ईश्वर असीम-अनन्त है। उस असीम-अनन्त को हम अपनी सीमित ज्ञानेन्द्रियों द्वारा समझ नहीं सकते (limited faculty से infimite को comprehend नहीं कर सकते)। जीवन में जैसे अनेक बातों की हमें जानकारी नहीं होती है,पर उसे बिल्कुल सत्य के रूप में मानते हैं,उसी प्रकार ईश्वर को माना ही जा सकता। वह इन्द्रिय गोचर नहीं है, स्व के द्वारा उसका अनुभव होता है।

देवकी बहन जी ने प्रवचन में कहा कि जिस प्रकार ज्योमेट्री में किसी थ्योरम को सिध्द करने के लिए एक प्राक्कल्पना (hypothesis) लेकर चलते हैं और अन्त में जो थ्योरम था वह सिध्द हो जाता है। उसी प्रकार ईश्वर को मान कर चलो तो वह अपने को जना भी देते हैं।

उनके अपने को जनाने के तरीके भी अनेक हैं। कुछ वर्ष उपरान्त मेरी माँ लखनऊ राधास्वामी सत्संग में भाग लेने के लिए गाजीपुर से कई और महिलाओं और पुरुष भक्तों के साथ आई थीं।........ लौटते समय मेरे सामने समस्या हुई कि उन्हें ट्रेन से कैसे भेजें। उनका स्वास्थ्य बहुत कमजोर था। पर वह अकेले फर्स्ट क्लास में जा नहीं सकती थीं और मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि एक अन्य साथी का उसी क्लास का टिकट लेकर उनके साथ भेज दूँ।

अत: उस जमाने का थर्ड क्लास का ही टिकट खरीद कर उन्हें साथ लेकर प्लेटफार्म पर ट्रेन की इन्तजार कर रहा था। प्लेटफार्म पर बड़ी भीड़ थी। मन में आया कि टे्रन तो हरदोई से चल चुकी होगी, यदि ईश्वर हैं तो रास्ते में वह कैसे मेरी माँ के लिए जगह बना देंगे। उस जमाने में एक डिब्बे में कई कम्पार्टमेंट अलग-अलग होते थे-साथ के लोग आगे दौड़कर गये। पर मैं माँ के साथ वही खड़ा रहा। पाठक गण पढ़कर आश्चर्यचकित हो जायेंगे कि मेरे ठीक सामने एक कम्पार्टमेंट रुका जो पूरा खाली था-केवल एक आदमी अन्दर से लॉक करके बैठा था। मैंने अन्दर झाँका तो उसने पूछा कि आना है। मेरे हाँ कहने पर उसने दरवाजा खोल दिया और मैंने माँ का विस्तर नीचे वर्थ पर बिछाकर उन्हें आराम से लिटा दिया। साथ वाले दौड़कर बुलाने आये कि आगे जगह बन गई है, तो मैंने माँ के साथ के लिए उन्हीं में से दो तीन को यहीं बुला लिया।

ईश्वर विश्वासी तो इसे संयोग (chance) न कहकर ईश्वर द्वारा इस तरीके से अपने को जनाना ही मानेंगे। अनेकों लोगों के ऐसे ही अनुभव अवश्य होंगे।

पिछले कुछ सूत्रों में ईश्वर-दर्शन,ईश्वर प्राप्ति आदि की चर्चा हुई है। साधकों के लिए जीवन का लक्ष्य योग,बोध और प्रेम कहा गया है। बोध अपने और ईश्वर को तत्वत: जानना ही तो है। परन्तु यह बोध या जानना ज्ञानेन्द्रियों से नहीं होता है बल्कि स्व द्वारा अनुभव होता है।

प्रभु प्रेम की प्राप्ति में ही जीवन की पूर्णता है। अत: ईश्वर को जानने के लिए नहीं बल्कि उनको मानकर उनके प्रेम की प्राप्ति के लिए हम लोगों को दृढ़तापूर्वक साधन-पथ पर अग्रसर होना है। स्वामी जी कहते थे कि उस प्रेम में अखण्ड अगाध रस है जिसकी न कभी क्षति होती है और न पूर्ति। नित-नव रस बना रहता है और साधक उसी में छका रहता है।

अपनी विद्यमानता का अनुभव तो वह कराते ही रहते हैं,बस हमें उसे समझना और पकड़ना है। प्रभु विश्वासी की दृष्टि में सर्वत्र उनकी विद्यमानता दिखाई देती है और प्रत्येक घटना में उनकी लीला का दर्शन होता रहता है।

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