Tuesday, May 10, 2011

-: साधन सूत्र-39 :-

-: साधन सूत्र-39 :-


मानव जीवन में वर्तमान की निर्दोषता


मानव जीवन की भौतिकता,आध्यात्मिकता एवं आस्तिकता के उच्च आदर्शों का पालन व्यवहारिक जीवन में सहज से हो सके,इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये कुछ मौलिक नीतियाँ मानव सेवा संघ दर्शन में प्रतिपादित की गई हैं जिनमें से एक है-

''वर्तमान सबका निर्दोष है''

इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है-

''यह नीति व्यक्तिगत जीवन को निर्दोष बनाने का एवं सामूहिक जीवन में निर्दोषता का प्रसार करने का अचूक उपाय है। जीवन मूलत: निर्दोष ही है क्योंकि जीवन का मूल स्रोत निर्दोष है। जब व्यक्ति दोष करता है तब दोषी हो जाता है। जब दोष करना छोड़ देता है तो मौलिक निर्दोषता सुरक्षित हो जाती है। भूतकाल के दोषों के आधार पर अपने को और दूसरों को दोषी मानते रहना निर्दोषता की सुरक्षा में बड़ी भारी बाधा है। ' मेरा वर्तमान निर्दोष है' ऐसा  मान  लेने  पर व्यक्ति आत्म-ग्लानि की ज्वाला से बच जाता है और आगे निर्दोष रहकर जीवन के विकास में उसकी प्रगति हो जाती है। 'वर्तमान सभी का निर्दोष है' ऐसा मान लेने पर हिंसा-द्वेष की वृत्ति मिटती है। मनुष्य के मस्तिष्क में दूसरे के प्रति बुरे भावों एवं बुरे विचारों का अन्त हो जाने बुराई का प्रसार रुक जाता है और निर्दोषता की भावना प्रसारित होने लगती है। इस दृष्टि से इस नीति का पालन व्यक्ति के कल्याण और सुन्दर समाज के निर्माण में अत्यन्त उपयोगी है।''

इसी विषय पर स्वामी शरणानन्द जी द्वारा और भी व्याख्या की गई है। साधन पथ में चित्त-शुध्दि का बहुत बड़ा महत्व है। बल्कि पहला प्रश्न् है- चित्त को शुध्द करना।

''चित्त शुध्द होने से सब प्रकार की पूर्णता आ जाती है। योगी का योग, विचार शक्ति को बोध और विश्वासी को प्रेम अपने आप मिल जाता है....... निर्दोषता की स्थापना से चित्त शुध्द होता है; क्योंकि मनुष्य अपने को जैसा मानता है, वैसा ही बन जाता है। यह प्रकृति का नियम है।''

इसको इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि जीवन में साधन-पथ में सफलता के लिए चित्त-शुध्दि परम आवश्यक है और चित्त-शुध्दि के लिए अपने में निर्दोषता की स्थापना नितान्त आवश्यक है। इसके दो पहलू हैं- एक तो यह कि 'प्राप्त विवेक के प्रकाश में अपने दोषों को देखना' और उन्हें पुन: न दोहराने का दृढ़ता पूर्वक व्रत लेना। इसके साथ ही अपने विवेक का आदर करते हुए जीवन में नवीन दोष न आने देना।

दूसरा पहलू यह है कि इस बात में पूर्ण आस्था हो कि मेरा वर्तमान (the livinig moment) और अन्य का भी वर्तमान निर्दोष होता है। अत: भूतकाल के दोषों के आधार पर स्वयं अपने को या औरों को दोषी न माने।

स्वामी जी के शब्दों में-

''अत: साधक को चाहिये कि दोषकाल में अपने को दोषी माने और उस समय दोष को देखकर भविष्य में उत्पन्न न होने देने का दृढ़ संकल्प करे। साधक को इस प्रकार विचार करना चाहिए कि दोष उत्पन्न होने के पहले मुझमें दोष नहीं था और मिट जाने के बाद भी नहीं रहेगा। अत: मैं स्वभाव से निर्दोष हूँ। फिर मुझमें दोष कैसे आ सकते हैं? इस प्रकार निर्दोष काल में निर्दोषता की दृढ़ भावना करने से दोष मिट जाते हैं और उनकी पुन: उत्पत्ति नहीं होती।''

उदाहरण के लिए उन्होंने कहा-

''झूठ न बोलने के काल में सभी सत्यवादी होते हैं। झूठ बोलकर समाप्त होते ही फिर सत्यवादी हो जाते हैं,हर समय कोई मिथ्यावादी नहीं रहता, इसी प्रकार हरेक दोष के विषय में समझ लेना चाहिए।''

आगे उन्होंने एक प्राकृतिक नियम की ओर साधकों का ध्यान आकर्षित कराया है:-

''जिसको मनुष्य स्वीकार कर लेता है वह दृढ़ हो जाता है। जिसकी स्वीकृति नहीं रहती उसकी सत्ता मिट जाती है, यह नियम है, अत: जिसको मिटाना हो उसे अस्वीकार कर देना चाहिए।''

यह भी समझना आवश्यक है कि हमारे जीवन में दोष उत्पन्न ही क्यों होते हैं। इस सम्बन्ध में संतवाणी है कि ''प्राणी स्वयं ही दोषों का पोषण करके उनको बलवान बना लेता है। दोष के कारण को मिटा देने से वह सुगमता से मिट सकता है। देह में ''मैं'' भाव और भोगों की चाह, यही दोषों की उत्पत्ति का कारण है''........

एक दूसरे अवसर पर कहा है कि-

''मैं शरीर हूँ यह मानना और संसार को चाहना, यही सब दोषों का मूल है। इनके मिटते ही सब दोष अपने आप मिट जाते हैं। एक दोष से दूसरे दोष का सम्बन्ध है। इसी प्रकार एक गुण से भी दूसरे गुण का सम्बन्ध है। अत: एक दोष के मिटने से दूसरे सब दोष भी मिट जाते हैं। तथा एक गुण को अपनाने से दूसरे गुण भी अपने आप जाते हैं।''

साधकों के लिए यह बहुत ही उत्साहवर्धक कथन है कि-''दोष प्राणी का स्वभाव नहीं है। इसलिए वह सदैव नहीं रह सकता। उसका उदय और अन्त अवश्य होता है। निर्दोषता के साथ प्राणी की जातीय एकता है, अत: वह हर समय निर्दोषी रह सकता है।''

परन्तु संत ने सचेत भी किया है कि ''मनुष्य का जीवन सर्वथा दोषयुक्त नहीं होता, उसमें गुण भी रहते ही हैं, परन्तु उन गुणों में जो अभिमान है वह भी दोष ही है।..... दोषों की उत्पत्ति न हो और गुणों का अभिमान न हो, यही वास्तविक निर्दोषता है।

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