-: साधन सूत्र-41 :-
करने में सावधान और होने में प्रसन्न रहना
मानव सेवा संघ दर्शन के प्रतिपादक ब्रह्मनिष्ठ संत स्वामी शरणानन्द जी के शरीर त्याग के पश्चात् श्री रघुकुल तिलक जी,जो राजस्थान के राज्यपाल भी रहे ने संस्मरण में लिखा कि स्वामी जी ने गीता के कर्मयोग को थोड़े से शब्दों में निरुपण किया- ''करने में सावधान और न होने में प्रसन्न रहना।''
जीवन के सम्बन्ध में मानव सेवा संघ दर्शन द्वारा कुछ मौलिक नीतियों का निरुपण किया गया है। उनमें से एक नीति यही है जो ऊपर अंकित है।
हम सभी लोगों का अनुभव है कि कुछ तो हम करते हैं और कुछ बिना हमारे किये ही अपने आप होता है। उदाहरण के लिए किसान ने बड़ी मेहनत से खेत बनाया,खूब बढ़िया बीज बोकर यथा समय खाद पानी दिया। फसल अच्छी लहलहाने लगी। कुछ ही दिनों की बात है,दाने पक जायेंगे तो काटकर घर में अनाज आ जायेगा। पर इसी बीच ओला वृष्टि हो गई और सारी फसल बरबाद हो गई। इसे क्या कहेंगे ?- 'होना' ही तो कहेंगे।
मरीज का इलाज डाक्टर पूरी ईमानदारी से पूरी योग्यता लगाकर सावधानी से करता है-कहीं चूक नहीं होने देता, घर वाले भी तिमारदारी बिल्कुल सही ढंग से करते हैं, कोई असावधानी नहीं होने देते- फिर भी मरीज बच नहीं पाता। इसीलिए तो डाक्टरों के क्लीनिक में और अस्पतालों में लिखा रहता है- WE TREAT HE CURES या DOCTOR TREATS HE CURES.
परन्तु यह हमें स्वीकार्य तभी होगा जब इलाज में पूरी सावधानी बरती जाय अर्थात् करने में सावधान रहें।
यदि हम असावधानी बरतेंगे तो तब 'होने' के बाद हमें ग्लानि होगी, अपने को दोषी और उस 'होने' का कारण मानेंगे। ऐसे में फिर 'होने में प्रसन्न रहना' तो नहीं हो पायेगा।
अत: जो विधि के विधान से अपने आप होता है,उसमें प्रसन्न रहना तब ही हो पायेगा जब हम अपने कर्म को पूरी सावधानी से करेंगे।
सावधानी का अर्थ कह सकते हैं,लक्ष्य पर दृष्टि रखते हुए अपनी पूरी सामर्थ्य और योग्यता लगाते हुए मेहनत और पूरी निष्ठा के साथ सही समय पर कार्य को करना।
मानव सेवा संघ के रजत जयन्ती स्मारिका में प्रकाशित लेख शीर्षक 'मानव सेवा संघ की नीति' में इस विषय की व्याख्या के कुछ अंश उध्दरित हैं जिनमें इस बिन्दु को साधक के दृष्टिकोण से समझाया गया है।
(1) मानव जीवन में कार्य-क्षमता के साथ-साथ विवेक का प्रकाश भी मिला हुआ है। ......''अत: कार्य-क्षमता का सदुपयोग बड़ी ही सावधानी से विवेक के प्रकाश में देखकर करना चाहिये। ......क्षमता के दुरूपयोग में व्यक्ति का हा्रस और सदुपयोग में विकास निहित है। इसलिये सावधानीपूर्वक प्रवृत्तिा कार्य-क्षेत्र की एक सुन्दर नीति है।
(2) ........सामूहिक सहयोग के बिना किसी कार्य का संपादन संभव नहीं है। समूह के वृहत् कार्य में उसी व्यक्ति का जीवन उपयोगी सिध्द होता है जो प्रत्येक प्रवृत्ति को सावधानीपूर्वक करता है।
(3) ........जो कर्ता अपने लक्ष्य को जाने बिना कर्म में प्रवृत्त होता है, उसकी प्रवृत्ति सावधानीपूर्वक नहीं होती। ......प्रत्येक प्रवृत्ति के फल दो रूपों में होते हैं- एक तो वह जो दृश्य् रूप से प्रतीत होता है और दूसरा वह जो अदृश्य रूप से उसके अहंभाव में अंकित हो जाता है। प्रवृत्ति का जो दृश्य फल बनता है उसका सुख-दु:ख प्रवृत्ति काल में ही कर्ता को प्रत्यक्ष हो जाता है,परन्तु प्रवृत्ति का दूसरा रूप जो अदृश्य के रूप में अंकित हो जाता है, उसका फल प्राकृतिक विधान के अनुसार कालान्तर में किसी न किसी परिस्थिति के रूप में प्रकट होता है। .........वर्तमान की असावधानी कालान्तर में बहुत ही दु:खद फल उत्पन्न करने वाली बन जाती है। इससे मुक्त रहने के लिये कर्ता को वर्तमान में प्रत्येक प्रवृत्ति में, करने में सावधान होना अनिवार्य है।
(4) ''यह कर्तव्य-विज्ञान का सत्य है कि सही प्रवृत्ति के फलस्वरूप कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति में सहज निवृत्ति की शान्ति अभिव्यक्त होती है। प्रत्येक प्रवृत्ति को सावधानीपूर्वक करना राग निवृत्ति का साधन है। ........राग निवृत्ति की ही शान्ति में योग,बोध और प्रेम की अभिव्यक्ति होती है। योग,बोध,प्र्रेम में ही जीवन की पूर्णता है। करने में सावधान रहने की नीति जीवन की पूर्णता का साधन है।''
इसके पश्चात् 'होने में प्रसन्न रहना' की चर्चा में कहा गया है कि-
''जो कुछ भी हो रहा है उसमें प्रिय घटनाओं को पकड़ लेने और अप्रिय घटनाओं को घटित होने से रोक देने में,व्यक्ति का कोई वश नहीं चलता। व्यक्ति जो चाहे सो हो जाय ऐसा सम्भव नहीं है। अत: जो कुछ हो रहा है उसमें प्रसन्न रहने की नीति ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को संतुलित रख सकती है। अचानक,अप्रत्याशित घटनाओं से क्षुब्ध होकर व्यक्ति अपने को बर्बाद कर लेता है। निज विवेक का आदर करने वाला व्यक्ति जीवन के इस सत्य को जानता है कि जो कुछ हो रहा है उस दृश्य-मात्र से त्रिकाल में भी उसका नित्य सम्बन्ध नहीं है। वह यह भी जानता है कि जो बन रहा है, बदल रहा है, बिगड़ रहा है और मिट रहा है,वह जीवन नहीं हो सकता। इस सत्य के आधार पर भी होने वाली घटनाओं के प्रति मनुष्य का यही रूख सही मालूम होता है कि वह स्वयं दृश्यों से असंग रहते हुए, जो हो रहा है, उसमें प्रसन्न रहे।''
''सृष्टि में जो कुछ भी हो रहा है,वह सृष्टिकर्ता के विधान से हो रहा है। इस तथ्य पर दृष्टि जाते ही 'जो हो रहा है' वह स्वाभाविक लगने लगता है। जो मंगलमय प्रभु के मंगलमय विधान में आस्था रखता है,वह जो हो रहा है,उसमें प्रसन्न रहने लगता है। अनन्त के मंगलमय विधान को स्वीकार कर लेने वाला.............प्रत्येक परिस्थिति को मंगलमय विधान से निर्मित,अपने लिये परम हितकारी जान कर,उसमें प्रसन्न रहता है। इतना ही नहीं,जिस ईश्वर-विश्वासी साधक ने एक अपने परम प्रेमास्पद की ही सत्ता को स्वीकार किया,उस एक से ही सम्बन्ध रखा,उसी की प्रियता को जीवन माना,उसकी प्रीति-निर्मित दृष्टि में 'जो कुछ हो रहा है' सब परम प्रेमास्पद की मधुर लीला ही दिखती है और वह उसमें आनन्दमग्न रहता है।''
''मानव जीवन के उच्चतम विकास के लिये करने में सावधान और होने में प्रसन्न रहने की नीति बहुत ही उपयोगी है।''
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