Saturday, May 21, 2011

-: साधन सूत्र-43 :-

-: साधन सूत्र-43 :-

ठहरी हुई बुद्धि में श्रुतियों का ज्ञान स्‍वत: प्रकट होता है


ब्रह्मनिष्ठ क्रान्तदर्शी प्रज्ञा चक्षु संत स्वामी शरणानन्द जी के साधना काल में उनके सद्गुरु ने उनसे कहा कि ''अरे भाई, ठहरी हुई बुध्दि में श्रुति का ज्ञान स्वत: अभिव्यक्त (प्रकट) होता है। उसकी पाठशाला है 'एकान्त' और पाठ है 'मौन'।''

उन्होंने ऐसा क्यों और कब कहा वह आगे की चर्चा से ज्ञात हो जायेगा। स्वामी शरणानन्द जी नौ वर्ष के बालक थे तभी उनकी दोनों ऑंखें चली गईं। घोर दु:ख आया। उन में यह प्रश्न् उठा कि क्या ऐसा भी कोई सुख होता है जिसमें दु:ख नहीं होता। उत्तर मिला हाँ साधुओं के जीवन में दु:ख नहीं होता। बस साधु होने की धुन लग गई। कुछ समय पश्चात् गाँव में एक संत मंडली आई। वह बालक भी वहाँ बैठा था। गाँव वालों ने संत को दु:खी बालक का दु:ख सुना दिया।

संत ने कहा- ''भैया! राम-राम कहा करो''। बालक ने कहा ''मेरा राम-नाम में विश्वास नहीं है''। संत ने कहा ''कोई बात नहीं। ईश्वर को तो मानते हो''? बालक ने कहा ''हाँ! ईश्वर को मानता हूँ''। इस पर संत ने कहा कि ''अच्छी बात है ईश्वर के शरणागत हो जाओ। ''संत ने कहा, बालक ने सुना। संत की वाणी जादू का काम कर गई।

संत की वाणी ने मंत्र का काम तो कर ही दिया था। जीवनी में साधुता का विकास आरम्भ हो गया था, परन्तु सन्यास लेना बाकी था। गुरु की आज्ञानुसार माता-पिता के जीवन काल तक रुके रहे। अब तक 18-19 वर्ष की आयु हो चली थी। अन्य संतों-भक्तों की मंडली लेकर सद्गुरु आये और वह घर सम्पत्ति आदि सब छोड़ कर सद्गुरु के साथ चल दिये और विधिवत् सन्यास ले लिए।

गुरु के पास बैठे-बैठे एक समय उन तेजोमय युवक सन्यासी के मन में उपनिषद् पढ़ने का संकल्प उठा, पर ऑंखें तो थीं नहीं, मन ही मन सोच कर चुप रह गये। तभी सद्गुरु ने बिना पूछे ही वह ज्ञानोपदेश उन्हें दिया जो ऊपर प्रथम प्रस्तर में अंकित है।

युवक सन्यासी को उत्तर मिल गया। संत (सद्गुरु) ने जो कहा, युवक सन्यासी जिनका अब शरणानन्द नामकरण हो चुका था, प्रज्ञा-चक्षु हो गये। ''मैं'' यह और 'वह' का प्रत्यक्ष बोध हो गया। फिर तो यह परिणाम हुआ कि उस वे पढ़े-लिखे की बात सुनकर बड़े-बड़े विद्व्द्वरेण्य भी चकित होने लगे।

गौतम बुध्द ने (राजकुमार सिध्दार्थ) गृह त्याग करने के बाद सत्य की खोज में घोर तप किया। यह सब सर्व विदित है, मात्र इतना लिखना पर्याप्त है कि उसके परिणाम स्वरूप शरीर बहुत ही कमजोर और शक्ति क्षीण हो गई थी। उठना, चलना भी कठिन हो गया था। तब वह बिल्कुल निष्चेष्ट हो गये। किसी प्रकार की कोई क्रिया या चिन्तन नहीं था;उस निष्चेष्ट अवस्था में ठहरी हुई बुध्दि में ज्ञान का प्रकाश अभिव्यक्त हो गया।

इसी प्रकार के तीन दृष्‍टान्‍तों का साधन साधन सूत्र-42 में उल्‍लेख किया गया है । प्रश्‍न् होता है कि ठहरी बुध्दि है क्या? सद्गुरु ने (प्रथम प्रस्तर) कहा कि उसकी पाठशाला है एकान्त और पाठ है मौन। एकान्त इसलिये कि उसमें भीतर बाहर से शान्त होना सहज होगा। भीड़भाड़ तथा शोरगुल में शान्त होने में व्यवधान होगा। भीतर बाहर से जब शान्त हो जाते हैं- कोई शारीरिक क्रिया या मानसिक हलचल नहीं होगी तब उसी शान्ति में विचार का उदय होता है और शान्ति में रमण नहीं करेंगे तब योग की प्राप्ति होती है।

ठहरी हुई बुध्दि का अर्थ हुआ जब बुद्धि ठहर गई अर्थात् उसमें कोई हलचल नहीं है- अचिन्त (thought lessness) की दशा है।

यह सबका अनुभव होगा कि बुध्दि का ठहराव क्षणिक भी होता है। किसी परिस्थिति विशेष में या किसी समस्या का हल समझ में नहीं आता है तब हम अपनी ओर से सोचना बन्द करके शान्त हो जाते हैं। उसी शान्ति में, बुध्दि की उसी क्षणिक ठहराव में समस्या का हल या किसी प्रश्न् का उत्तर अपने आप आ जाता है। इसका इस प्रकार कह सकते हैं कि हमारी चेतना में उस परम चैतन्य से उत्तर आ जाता है। जब बुध्दि ठहर जाती है तब हमारा चेतन उस परम चैतन्य से जुड़ जाता है। वह परम चैतन्य सभी कुछ तो है गणितज्ञ,वैज्ञानिक,भाषाविद्,संगीतज्ञ आदि सभी प्रकार का ज्ञान उसी से तो निकला है। इसीलिए साधन सूत्र-42 में वर्णित छात्र को उन्होंने कोआर्डिनेट ज्योमेट्री के प्रश्न् का उत्तर बता दिया।

ऐसा भी बहुतों को अनुभव होगा कि किसी परिस्थिति विशेष में क्या करना है समझ में नहीं आता तब यदि हम शान्त हो जाते हैं तो उसी शान्ति में मार्गदर्शक के रूप में विचार का उदय होता है। इसे स्पष्ट करने के लिए एक दृष्टांत प्रस्तुत है। एक व्यक्ति को एक अवसर पर अचानक उपस्थित लोगों को कुछ सुनाने की बात कही गई। अपनी ओर से उसने कुछ नहीं सोचा। क्षणभर की स्वमेव शान्ति या बुध्दि का ठहराव कहें, में क्या बोलना है उसमें अपने आप आ गया।

इस प्रसंग में कुछ अपना अनुभव प्रस्तुत कर रहा हूँ । नाती जो दसवें कक्षा में है कभी-कभी गणित के प्रश्न् पूछता है। यह विषय 65 वर्ष पहले पढ़ा था। फिर भी उनके हल काफी हद तक बता लेता हूँ। परन्तु कभी-कभी हल समझ में नहीं आता है। विभिन्न अवसरों पर एक ज्योमेट्री, एक एल्जेब्रा और एक ट्रिग्नामेट्री के प्रश्न् का हल जब समझ में नहीं आ रहा था, तब क्षण भर के लिए शान्त हो गया। स्फुरण के रूप में तीनों के हल जो विशेष ढंग के थे, अपने आप आते गये।

ऐसा ही अनुभव अनेकों को अपने विद्यार्थी जीवन का भी होगा। उस समय यह समझ में नहीं आया कि ऐसा कैसे हो जाता है। पर मानव सेवा संघ दर्शन से परिचित होने पर 'ठहरी हुई बुध्दि' का महत्व समझ में आया।

अत: मानव सेवा संघ के इस दर्शन के महत्व को स्वीकार करके, सब भांति अपने हितार्थ, एक कार्य के अन्त और दूसरा कार्य प्रारम्भ करने के मध्य थोड़ी-थोड़ी देर शान्त होने का स्वभाव बनाना उपयुक्त होगा। इससे मानसिक थकान नहीं होगी और विचार का उदय भी होगा। नित्य-योग की प्राप्ति हेतु पिछले साधन-सूत्रों में वर्णित मूक-सत्संग को अपनाना हितकर होगा। नित्य-योग की प्राप्ति से ही बोध और प्रेम की प्राप्ति होती है जो मानव की मांग और जीवन का लक्ष्य है। जैसा पहले सूत्रों में लिखा गया है, मूक-सत्संग के लिये सबसे अच्छा समय तो प्रात:काल (early morning) ही है जब वातावरण शुध्द और शान्त होता है। अन्यथा रात्रि में सोने से पहले या दिन-चर्या में जब भी अवकाश मिले इसे नियमपूर्वक (regularly)अपनाना,हमारे जीवन में विकास की दिशा में चमत्कारी/विस्मयकारी (amazing) परिवर्तन लायेगा।

यहाँ एक महत्व की बात सोचने और समझने की है कि उस परम तत्व-परमात्मा से नित्य ही इस प्रकार से जिसका पूर्व प्रस्तरों में वर्णन किया गया है हमारी मुलाकात होती है फिर भी हमें इसका एहसास क्यों नहीं होता। वह हमारे अन्दर बाहर सदैव विद्यमान हैं,फिर भी उनकी नित्य विद्यमानता का अनुभव क्यों नहीं होता। सबसे पहला कारण तो यह प्रतीत होता है कि हम इसके बारे में इस प्रकार सोचते ही नहीं। मशीनवत् यह सब चलता रहता है हमारे लिये, हम इसके पीछे उस रहस्य पर ध्यान ही नहीं देते।

इसके अतिरिक्त हमने जीवन में उस परम कृपालु,महिमावान के प्रेम की आवश्यकता ही नहीं समझा है। केवल सांसारिक मांगों को लेकर मात्र उन अवसरों पर उन्हें स्वार्थवश याद करते हैं।

हमें यदि आनन्दमय,रसपूर्ण जीवन चाहिये तो उनके प्रति आस्था,श्रध्दा और विश्वास को अपनाते हुए,उन्हें साधन के बजाय साध्य स्वीकार करना होगा।

सोच कर ही लगता है कि वह जीवन कितना सुन्दर होगा जिसमें शान्ति होगी,स्वाधीनता होगी और प्रियता होगी।

-मानव सेवा संघ दर्श पर आधारित एवं उध्दरित

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