Sunday, March 6, 2011

-: साधन सूत्र-19 :-

-: साधन सूत्र-19 :-

''भले से भलाई''

''The secret of religion lies not in theories but in practice. To be good and do good that is the whole of religion.''
- Swami Vivekanand

He has not said - do good and you will be good. He has put 'be good' first. If one is good, good deeds follow naturally. But 'be good' how?

जब कोई व्यक्ति अपने बारे में ईमानदारी से सोचता है और अपने को अपनी दृष्टि में निर्दोष एवं भला देखना चाहता है तो प्राय:भलाई-अच्छे कार्य करने को सोचता है और करता भी है।
परन्तु वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति का मूल स्वरूप निर्दोष और विशुध्द होता ही है। जीवन में दोषों और बुराइयों को अपनाकर अपने उस स्वरूप को आच्छादित कर देता है-ढक देता है,जिससे उसका व्यक्तित्व दोष एवं बुराई युक्त हो जाता है।
शीशा साफ-पारदर्शी है,परन्तु उस पर धूल जम जाने पर वह गंदा दिखने लगता है। धूल को अच्छी तरह झाड़ दिया जाता है तो वह पुन: अपने मूल स्वरूप-स्वच्छ एवं पारदर्शी रूप में आ जाता है।
उसी प्रकार जिन दोषों-बुराइयों ने व्यक्ति के मूल दोष-रहित तथा भले स्वरूप को धूल की भाँति आच्छादित किये हुए है, उन्हें अपने जीवन से झाड़कर निकाल देता है तब वह अपने आप ही भला हो जाता है जो वह पहले से ही मूल रूप में है। जैसे झूठ बोलना छोड़ दें तो सच ही तो बोलेंगे।
जब कोई व्यक्ति अपने जीवन से बुराई निकाले बिना ही कोई भला/परोपकारी कार्य करने की सोचता है या करता है तो इसके पीछे प्राय: दो ही आशय होते हैं। प्रथम, इसके पीछे कोई स्वार्थ होता है-दानियों/परोपकारियों की लिस्ट में नाम आ जायेगा,मान सम्मान मिलेगा अथवा चुनाव के लिए वोट बैंक बनेगा,आदि। इससे भला बनना तो दूर रहा, व्यक्तित्व दोषयुक्त,बुराई युक्त यथावत बना रहता है बल्कि और गिरावट ही आती है। द्वितीय, भला बनने की सच्ची (genuine) इच्छा से प्रेरित होकर भलाई का कार्य करता है, परन्तु होता उल्टा है-अहं की पुष्टि और बदले में किसी फल की कामना, कुछ नहीं तो यही कि पुण्य होगा और परलोक सुधरेगा।
अत: यदि भला बनने की सच्ची उत्कष्ठा है तो मानव सेवा संघ दर्शन के अनुसार इस भ्रम को मिटाना होगा कि भलाई के कार्य करके हम भले हो जायेंगे। वास्तविकता यह है कि जब कोई व्यक्ति अपने प्राप्त विवेक के प्रकाश में अपनी जानी हुई बुराइयों को अपने जीवन में से निकाल देता है, तब वह स्वत: भला हो जाता है। जब वह भला हो जाता है, तब उससे स्वभावत:भलाई होती है। मात्र इस बारे में सजग रहना है कि इस भलाई का कर्तृत्व का अभिमान और उससे किसी प्रकार के फल की अपेक्षा न हो, जैसे मान-सम्मान, कृतज्ञता आदि।
इनसे बचना सहज हो जाता है यदि मन में सच्ची भावना बनी रहती है (और यह यर्थाथ भी है) कि जिस साधन (शरीर बल, धन बल, बुध्दि बल) से किसी की भलाई-सेवा करते हैं, वह साधन प्रकृति ने (ईश्वरवादी है तो)ईश्वर ने ही दिया है और जिस व्यक्ति की हम भलाई/सेवा करते हैं उसी के लिए दिया है। अत: तेरा तुझ को अर्पण, क्या लागे मेरा भाव अनुभूत सत्य के रूप में निरन्तर अंतरमन में बना रहे तो यह अभिमान और फलासक्ति से बचने के लिए कवच का काम करेगा।
यहाँ यह स्पष्ट करना श्रेयस्कर होगा कि पुरुषार्थवादी व्यक्ति कह सकता है कि वह सब साधन मैंने अपने पुरुषार्थ से अर्जित किया है। वह यह तो सोचे कि पुरुषार्थ करने की सामर्थ्य भी तो प्रकृति / ईश्वर ने ही दिया है।
भाग्यवादी कह सकते हैं कि मेरे कर्मों से भाग्य बना और मेरे भाग्य से ये सारे साधन जुटे। पर यहाँ थोड़ा भ्रम है। जो प्राप्त होता है उसमें अनेकों के भाग्य जुड़े होते हैं। विचार करने की बात है कि किसी साधन की प्राप्ति अथवा सुखद परिस्थितयों से जो-जो लोग-जैसे परिवार में पत्नी, बच्चे अन्य परिजन प्रभावित होते हैं- उसे उपभोग (Share) करते हैं, क्या उनका भाग्य नहीं जुड़ा हुआ है?अत:यदि ईमानदारी से ऐसा भाव बना रहे तो स्वार्थभाव और अहंकार से बचे रहते हैं।
अत:अपने जीवन में से जानी हुई बुराइयों को निकालना अनिवार्य है। इसके हेतु आत्म-निरीक्षण आवश्यक है, रात में सोने से पहले, जिससे कि की हुई भूल को जानकर उसे पुन: न दोहराने का व्रत (दृढ़ निश्चय) लेकर अपनी स्वाभाविक निर्दोषता को अखण्ड बनायें। जब व्यक्ति अपने प्रति ईमानदार हो जाता है तब उसका आत्म निरीक्षण निरन्तर चलता रहता है, जैसे ही कोई गलत कार्य होता है, उसका विवेक तुरन्त टोक देता है।
किसी-किसी व्यक्ति की ऐसी प्रवृत्ति हो सकती है कि अपने गलत किये को अनुबोध (after thought) द्वारा उचित ठहराने का प्रयास (justify) करता है। इस प्रवृत्ति के पीछे भी यदि देखा जाये तो वह अपने को सही तथा दोषरहित देखने और दिखाने की इच्छा से ही प्रेरित होता है। परन्तु ऐसा करना एक प्रकार से अपने को ही धोखा देने के समान है। उसे तो पूरी ईमानदारी और निष्पक्ष भाव से अपना आत्म-निरीक्षण करना है।
कभी-कभी अनचाहे ही,बिना विचारा,हमसे गलत/कटु बोल निकल जाता है या गलत आचरण हो जाता है। इस संबंध में ब्रह्मलीन संत कृष्णानन्द जी का उद्बोधन बहुत ही प्रासंगिक और अपने कल्याण हेतु अनुकरणीय है:-
''हमारा अवचेतन मन (Subconscious mind) मनोभाव, भावनाओं, विचारों एवं कल्पनाओं का उद्गम स्थान है। वह सोखता (blotting paper) के समान समस्त भावों/विचारों आदि को अन्तर्लीन कर लेता है। वह समस्त सुझावों को बिना किसी तर्क,प्रश्न या शर्त के वास्तविक जानकर स्वीकार करता है। बाद में सुझाव स्वत: चेतन मन में स्थानान्तरित हो जाते हैं और हम तद्नुरूप सोचना, करना शुरू कर देते हैं तथा वैसे ही बन जाते हैं।''
अत: यदि हम अपने को बुराई रहित बना लेते हैं तो हमसे मन वचन कर्म से कोई बुराई होगी नहीं और अपने अवचेतन मन (Subconscious mind) में कोई नये दोषपूर्ण निवेश (input) नहीं जायेंगे और कोई नये गलत संस्कार नहीं बनेंगे। जो पहले से गलत प्रभाव अंकित है वे वर्तमान में किये जाने वाले भूल रहित, दोषरहित आचरण/कार्य से मिटते और नये शुध्द संस्कार बनते जायेंगे।
मानव सेवा संघ के नियम-1 ''आत्म निरीक्षण अर्थात् प्राप्त विवेक के प्रकाश में अपने दोषों को देखना'' और नियम संख्या-2 ''की हुई भूल को पुन: न दोहराने का व्रत लेकर सरल विश्वास पूर्वक प्रार्थना करना''का निष्ठापूर्वक पालन करने से हमारा अवचेतन मन (Subconscious mind) अशुध्द संस्कारों से रहित हो जायेगा और चेतन शुध्द हो जाने से हमसे चाहे या अनचाहे कोई गलत कार्य होगा नहीं।
इसी आशय का संदेश स्वामी कृष्णानन्द जी का है कि ''रात्रि में सोने से पूर्व हम जो आत्म सुझाव (auto suggestion) अपने अवचेतन मन को देते हैं उनसे हमारे संस्कार प्रबल, प्रभावपूर्ण और सकारात्मक बनते हैं'' जैसे- मैं निश्चिन्त हूँ-मैं निर्मल हूँ-मैं शांत हूँ- मैं संसार से असंग हूँ- मैं जीवनमुक्त हूँ-मैं सच्चिदानन्द हूँ-मैं विश्वआत्मा हूँ'' आदि ।
इस प्रकार अपने जीवन में से बुराई निकाल देने से चेतन और अवचेतन शुध्द हो जाने से स्वभाव से ही हमसे भलाई होगी। स्वामी शरणानन्द जी का उद्बोधन है कि भलाई करो चाहे न करो, पर किसी को बुरा न समझो, किसी का बुरा न चाहो और किसी के प्रति बुराई न करो, तो यह स्वयं में संसार की बहुत बड़ी सेवा है।

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