-: साधन सूत्र-24 :-
आस्था-श्रध्दा-विश्वास
ईश्वर के सम्बन्ध में साधकों के लिये तीन शब्दों,आस्था,श्रध्दा और विश्वास का प्रयोग होता है।
सर्वप्रथम तो,ईश्वर केवल मानने का ही है। हम अपने जीवन में बहुत कुछ मानते ही हैं,हमारी व्यक्तिगत जानकारी नहीं होती है। यह मेरा भाई है,बहन है,माता है,पिता है आदि बचपन से सुनकर माना ही तो जाता है। तो फिर वेद वाणी से,गुरू वाणी से,संतवाणी से सुनकर कि ईश्वर है इसी में क्यों विकल्प और प्रश्न् होता है? मैं ईश्वर को नही मानता हूँ - यह एक प्रकार की ऐंठ (snobbery) ही है। वैसे अधिकांश यह तो मानते ही हैं कि एक कोई सत्ता है जो इस समस्त सृष्टि का रचयिता है। परन्तु,वही अपना सच्चिदानन्द स्वरूप ईश्वर है,परम कृपालु और सबका रखवारा यह स्वीकृति नहीं बन पाती।
हमारे न मानने से उनकी सत्ता में कोई अन्तर नही होने का और हमारे न मानने पर भी वे परम उदार हमारे पर कृपा करना बन्द नही करते। ऐसा नहीं करते कि मुझे नहीं मानोगे तो साँस नहीं लेने देंगे या इन्द्रियाँ काम नहीं करेंगी आदि। उन्होंनें हमें पूर्ण स्वाधीनता दे रखा है कि हम उन्हें माने या न माने।
पर यह तो हमारी अपनी आवश्यकता है कि हमें नित्य और सर्वत्र विद्यमान,सामर्थ्यवान और अहैतु की कृपा करने वाले,जो पात्र कुपात्र का विचार किये बिना ही कृपा की अनवरत वर्षा करते हों,का सहारा चाहिये। उनके होते हुए हम अनाथ और असहाय हैं नहीं,मात्र उनको स्वीकार करके अपने को सनाथ और किसी समर्थ का सम्बल प्राप्त अनुभव करेंगे।
स्वामी शरणानन्द जी कहते थे कि बस इतना ही तो मानना है कि ईश्वर हैं -सर्वत्र हैं,सदैव हैं,सबके हैं,समर्थ हैं,ऐश्वर्यवान हैं,और अद्वितीय हैं। सदैव हैं तो अभी भी हैं,सर्वत्र हैं तो मुझमें भी हैं,सबके हैं तो अपने भी हैं,महिमावान हैं और अपने जैसे एक ही हैं। वह हमें अपना जानते और मानते भी हैं।
यह तो हमारी भूल है कि हम उनसे विमुख हैं। स्वामी जी कहा करते थे कि वह तो लालायित रहते हैं कि यह मेरा अपना कब मेरी ओर निहारे। वह तो पूर्ण हैं,उन्हें किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं है। उन्हें तो मात्र प्रेम चाहिए।
हमें तो उनकी सत्ता स्वीकार करके उनसे आत्मीय सम्बन्ध मानकर उनका प्रेमी बन जाना है। प्रेम में देना ही देना होता है-जहाँ चाह हुई कि वह भी हमें प्रेम करें (अपने दैनिक जीवन में भी) तो वह प्र्रेम न होकर प्रेम का व्यापार हो गया।
वे मेरे अपने हैं बस इसलिये वे मुझे प्यारे लगते हैं। वे मुझे प्यार करेंगे या करते हैं कि नहीं,यह वे ही जाने। यह एक दृष्टिकोण की बात है अन्यथा वह हमें प्यार तो करते ही हैं नहीं तो अहैतु की कृपा की अनवरत वर्षा क्यों करते रहते।
उनकी सत्ता स्वीकार करने पर यह ध्यान रखना आवश्यक है कि हम उन्हें अपना साध्य (The One sought after) बनायें न कि सांसारिक उपलब्धियों के लिये साधन (tool).
हमसे यह भी भूल होती है कि हम अपनी सांसारिक इच्छाओं/कामनाओं की पूर्ति के लिये उनसे कहते रहते हैं। अरे,क्या वह अज्ञानी हैं,क्या उन्हें हमारी आवश्यकताओं का पता नहीं है? जो वह आवश्यक समझेंगे वह हमारे मांगे बिना ही पूरा कर देंगे और करते हैं। स्वामी जी का उद्बोधन है 'शरणागत के आवश्यक कार्य प्रभु स्वयं पूरा करते हैं।' और यह शरणागत् साधकों का अनुभव भी है। वह कहते थे कि प्रभु से कुछ भी न मांगना अन्यथा घाटे में रहोगे। कृष्ण-सुदामा का प्रसंग इसका सटीक उदाहरण है। द्वारिका जाकर सुदामा जी ने कुछ नहीं मांगा तो उन्हें क्या क्या नहीं मिला। और यदि वह मांगे होते तो कदाचित् यही कहते कि बड़ी गरीबी है,दो जून खाने का प्रबन्ध कर दो। तो मांगने पर घाटा ही तो होता।
स्वामी जी ने आगे कहा कि अगर उनसे कुछ मांगना ही है तो मात्र यह कि प्रभु तुम मुझे प्यारे लगो; मुझे अपना प्रेमी बना लो।
सो ''विकल्प रहित भाव से उसे स्वीकार करने का नाम ही आस्था है।''
''उसकी महिमा को स्वीकार करना आस्थावान में श्रध्दा उत्पन्न करता है। जब साधक स्वीकार कर लेता है कि उस महामहिम की महिमा का वारापार नहीं है तो उसमें स्वत: श्रध्दा की अभिव्यक्ति होती है।''
''श्रध्दा के जागृत होते ही अन्य विश्वास, अन्य सम्बन्ध, अन्य चिन्तन नहीं रहता और फिर एक ही विश्वास, एक ही सम्बन्ध, एक ही चिन्तन रह जाता है। इस दृष्टि से आस्था,श्रध्दा,विश्वासपूर्वक साधक उस अद्वितीय,सर्वसमर्थ से जातीय एकता तथा नित्य सम्बन्ध स्वीकार करता है और फिर स्वत: अखण्ड स्मृति जागृत होती है।''
विडम्बना यह है कि संसार जो अनित्य और परिवर्तनशील है वह तो हमारी भूल से प्राप्त मालूम होता है और जो नित्य प्राप्त अविनाशी तत्व (ईश्वर) है,वह दूर मालूम होता है। संसार के पीछे दौड़ते रहते हैं, फिर भी पकड़ में नहीं आता तब निराश होकर अपनी भूल का एहसास करते हैं तो अपने ही में विद्यमान नित्य,अविनाशी,रसरूप जीवन की मांग का परिचय हो जाता है और उसकी प्राप्ति के लिये हम साधन-पथ अपनाते हैं। वह परम तत्व तो पहले से ही प्राप्त है,बस उससे जो विमुखता है उसका अन्त होकर उसकी सम्मुखता हो जाती है।
प्रभु तो 'सबके अकारण हितू','अत्याधिक दयालु','दया करने में कभी आलस्य न करने वाले हैं।' (गजेन्द्र मोक्ष से)
उनकी कृपालुता का पारावार नहीं है और यही साधक के लिये सबसे उत्साहवर्धक आश्वासन है। वह सबसे मिलते हैं। ''यदि भक्त को प्रभु भक्तवत्सलता के नाते मिलते हैं तो भाई,पतित को पतितपावन होने के नाते मिलते हैं।'' वाह रे प्रभु,तुम महान हो।
-मानव सेवा संघ दर्शन पर आधारित एवं उध्दरित
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