Wednesday, March 9, 2011

-: साधन सूत्र-21 :-

-: साधन सूत्र-21 :-

ईश्वर-दर्शन और ईश्वर प्राप्ति

अक्सर लोग जिज्ञासावश या सच्ची लालसा लेकर प्रश्न् करते हैं कि क्या ईश्वर का दर्शन हो सकता है या उनकी प्राप्ति हो सकती है। इस विषय पर किन्हीं साधकों द्वारा किये गये प्रश्नों का ब्रह्मलीन संत स्वामी शरणानन्द जी द्वारा दिया गया उत्तर बहुत सरल और स्पष्ट है जो यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

1.प्रश्न्: स्वामी जी! भगवान का दर्शन कैसे हो सकता है ?
उत्तर: भगवत् प्रेम का महत्व है, भगवत् दर्शन का कोई महत्व नहीं है। भगवान रोज दिखें और प्यारे न लगे तो तुम्हारा विकास नहीं होगा। भगवत विश्वास,भगवत सम्बन्ध और भगवत् प्रेम का महत्व है।

2.प्रश्न्: भगवान का दर्शन कैसे हो?
उत्तर: भगवान से नित्य सम्बन्ध स्वीकार करें और इस सत्य को स्वीकार करें कि सभी वस्तुएं भगवान की हैं और भगवान की सत्ता से प्रकाशित है तो सभी वस्तुओं में भगवान का दर्शन होगा।

3.प्रश्न्: भगवान प्राप्ति का सुगम उपाय क्या है ?
उत्तर: भगवान को पसन्द करना ही भगवत् प्राप्ति का सुगम उपाय है सभी सम्बन्धों को एक सम्बन्ध में,सभी विश्वासों को,एक विश्वास में एवं सभी इच्छाओं को एक आवश्यकता में विलीन कर देना भगवान को पसन्द करने का अर्थ है।

4.प्रश्न्: भगवत् प्राप्ति में विघ्न क्या है ?
उत्तर: संसार को पसन्द करना ही भगवत् प्राप्ति में सबसे बड़ा विघ्न है।

5.प्रश्न्: हम ईश्वर के होने पन में आनन्द का अनुभव क्यों नहीं कर पा रहे हैं?
उत्तर: क्योकि हमने ईश्वर को साध्य न मानकर साधन मान रखा है। हम चाहते हैं कि ईश्वर हमारी सुख, सुविधा, सम्मान को सुरक्षित रखें। अत: ईश्वरीय आनन्द का अनुभव करने के लिये ईश्वर को साधन न मानकर साध्य मानें और उनकी आवश्यकता अनुभव करें।

6.प्रश्न्: स्वामी जी भगवान छिपा क्यो रहता है ?
उत्तर: अपना तो है। अपना लड़का भले ही विदेश चला जाय,परन्तु उसका प्यार कम नही होता इसी तरह प्रभु चाहे छिपे हुए हैं,परन्तु अपने तो हैं।

नोट:-उपरोक्त प्रश्न् और उनके उत्तर भिन्न-भिन्न अवसरों से संकलित किये गये हैं जिन्हें एक क्रम में लिख दिया गया है।

नोट:-स्वामी जी ने प्रभु प्रेम पर बल देने के लिये इस ढ़ग से समझाया है,अन्यथा वास्तव में ईश्वर कहीं छिपा नहीं है यह तो हमारी दृष्टि और समझ का फेर है कि वह हमे छिपा हुआ लगता है। इसके दो मुख्य कारण है -पहला तो यह कि हमें इस बात की विस्मृति हो जाती है कि केवल ईश्वर ही है-उसके सिवा कोई और नही कुछ और नहीं। वह सर्वत्र है और सदैव है। कोई ऐसा स्थान ही नहीं जहां वह नहीं है यह सारा ब्रहमाण्ड,सभी जीव प्राणी,वृक्ष पर्वत नदी आदि पृथ्वी सहित वही हैं वे ही सबकुछ हैं और सबमें व्याप्त हैं। इसको इस प्रकार कह सकते हैं कि ईश्वर ने ही अपनी इच्छा से अपने ही में अपने से अपने ही द्वारा समस्त सृष्टि का निर्माण किया है और वे ही इसका अनेक रूपों में लालन पालन संचालन करते हैं। जब यह ज्ञान आत्मसात हो जाता है तब फूल में भी वही मुस्कराते हुये दीखने लगते हैं,पवन जब बदन को छूता है तब उन्हीं का शीतल स्पर्श प्रतीत होता है। कोयल की कूक में उन्हीं का स्वर सुनाई देता है।

वही हर समय हर जगह अनेकों रूप में दिखाई पड़ता है,सभी ज्ञानेन्द्रियों से उसी का अनुभव होता है,तो वह छिपा कहाँ है। भ्रम के कारण हम लोग कहते हैं कि ऊपर वाला जाने,या उनके लिये आसमान की ओर देखते हैं। अरे भाई,वह किस कोने में या किस दिशा में नहीं है जो हम ऊपर देखते हैं। यही बात स्वामी जी ने ऊपर प्रश्न्-2 के उत्तर में कहा है। हमलोग कहते तो हैं ''सीयराम मय सब जग जानी,करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी''परन्तु यह जिह्वा या बुध्दि स्तर पर ही रह जायेगा तब सर्वत्र सीयराम का दर्शन कैसे हो पायेगा?
 छिपा समझने का दूसरा कारण यह है कि उनके अवतारी साकार रूप राम, कृष्ण और उनके अन्य साकार रूप जिन्हें हम विग्रह के रूप में पूजते हैं,हमारी कल्पना में भरे हुए हैं। हमलोग अपनी कल्पना के अनुरूप उनके सजीव शरीरी रूप में दर्शन को ही दर्शन समझते हैं। उन विग्रहों को हम प्रतीक मात्र मानते हैं। यहीं भूल हो जाती है-कि वह प्रतीक भी हैं और साक्षात देव अथवा देवी भी हैं। जब उस परम तत्तव के अतिरिक्त कोई है ही नहीं,तो उस विग्रह में उन्हीं की सत्ता तो मूर्तिमान है। जब हम निस्सन्देहतापूर्वक इसे अन्त:करण से स्वीकार कर लें तब उसी विग्रह में उस देव/देवी का साक्षात दर्शन होगा। बहुत वर्ष पुरानी बात है मेरठ में गृहस्थ संत प्रो0 शिवानन्द जी से मिलने गया था। मुझे वह अपनी पूजा गृह में ले गये। हनुमान जी की तस्वीर टंगी थी। मैंने कहा बहुत अच्छी तस्वीर है। वह तपाक से बोले मेरे तो यह हनुमान जी हैं। यही दृष्टि का फेर है। उनकी दृष्टि में वह साक्षात हनुमान जी ही थे। उन्होंने सही ही कहा था। संतों से सुना है कि वह भक्तों की तीव्र उत्कण्ठा/लालसा के वश होकर साकार सजीव शरीरी रूप में भी दर्शन देते हैं और विनोद लीला भी करते हैं।
और ईश्वर का दर्शन,उनकी अनुकम्पा के रूप में भी तो होता है। हर व्यक्ति के जीवन में अनेक ऐसे अवसर आते हैं जो प्रभु की विशेष अनुकम्पा का ही परिणाम होते हैं। यदि हम उसे chance या good luck कहने के बजाय प्रभु की कृपा समझेंगे तो हमें उनकी अनुकम्पा के ही रूप में उनका दर्शन होगा और हम उस अनुभूति से आनन्द विभोर हो जायेंगे।
बहुत साल पुरानी बात है स्वामी कृष्णानन्द जी महाराज को मोटर कार से लेकर जा रहा था। यकाएक एक लड़का कार के सामने से रोड क्रास करके भाग गया। मैंने स्वामी जी से कहा कि भगवान ने खूब बचाया -मेरी कोई गलती नहीं,पर यदि लड़का कार की चपेट में आ जाता तो पब्लिक मेरी कार तोड़ दी होती और मेरी पिटाई भी कर दिया होता। वह हमेशा मौन रहा करते थे, कागज़ पर लिखा '' He protects us all the time'' ''पर जब कोई unusual बात हो जाती है तब हमें भगवान ने बचाया, ऐसा कहते हैं।'' उन्होंने आगे लिखा कि '' We must learn to see His Grace in every event''
सच ही कहा है। हम साँस ले रहे हैं, कान से सुन रहे हैं, मुँह से बोल रहे हैं ऑंख से देख रहे हैं आदि यह सब भी event ही तो हैं और यह सब उन्हीं की अनुकम्पा से ही तो हो रहा है। यह सोच हमारे जीवन में उतर जाय तो फिर उनकी living presence की अनुभूति होती रहे और बस आनन्द ही आनन्द रहे।

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