-: साधन सूत्र-22 :-
मनुष्य जन्म की सार्थकता
विधाता ने मनुष्य को अन्य योनियों के प्राणियों से भिन्न,विशेष विभूतियाँ देकर उसकी रचना की है। यह हमारी अपनी पसन्द है कि हम पशु योनि की भांति खाये-पीये,सुख-दु:ख भोगें,विवश होकर जीये और जन्ममरण के चक्र में फॅंसे रहें अथवा विधाता द्वारा प्रदत्त विशेषताओं का सदुपयोग करके चिन्मय रसरूप अविनाशी जीवन प्राप्त करके अपने मनुष्य जन्म को सोद्देश्य (Purposeful) बनायें।
इसके लिये फिर हमें अपने को 'मानव' स्वीकार करना होगा। मानव सेवा संघ के अनुसार मानव किसी आकृति विशेष का नाम नहीं है। जो प्राणी अपनी निर्बलता एवं दोषों को देखने और उन्हें निवृत्त करने में तत्पर है वही वास्तव में मानव कहा जा सकता है।
दूसरे शब्दों में जिस व्यक्ति में मानवता है वही मानव है। मानवता के तीन लक्षण है:-
(1) विचार, भाव और कर्म की भिन्नता होते हुए भी स्नेह की एकता (प्रेम)।
(2) अभिमान रहित निर्दोषता (त्याग)।
(3) अपने अधिकार का त्याग एवं दूसरों के अधिकार की रक्षा (सेवा)।
व्यक्ति जिस समाज में रहता है उससे उसका अविभाज्य सम्बन्ध है जिसका क्रियात्मक रूप ही,व्यक्ति द्वारा समाज की सेवा है-अर्थात् व्यक्ति अपने तीन विशिष्ट गुणों द्वारा समाज की सेवा कर सकता है:-
(1) व्यक्ति की निर्दोषता से समाज निर्दोष होता है।
(2) स्नेह की एकता से संघर्ष का नाश होता है।
(3) अपने अधिकार के त्याग और दूसरों के अधिकार की रक्षा से सुन्दर समाज का निर्माण होता है।
इन तीनों द्वारा अपना भी कल्याण होता है।
मानव में ही बीजरूप से परम शान्ति,परम स्वाधीनता और परम प्रियता की मांग विद्यमान रहती है। कर्तव्य परायणता के बिना शांति नहीं मिल सकती, अपने ही में सन्तुष्ट हुए, अचाह हुए बिना स्वाधीनता नहीं मिलेगी और प्रियता के लिए नित्य विद्यमान,परमतत्व,प्रेम स्वरूप ईश्वर को अपना आत्मीय मानना ही होगा जो वह पहले से ही है।
मनुष्य जीवन का अपना महत्व है। इसे भूल जाने का ही यह परिणाम होता है कि व्यक्ति अपना मूल्यांकन सांसारिक उपलब्धियों वस्तु,योग्यता सामर्थ्य एवं परिस्थिति के आधार पर करने लगता है जिससे वह इनकी दासता में आबध्द हो जाता है। जिसका परिणाम दु:ख और दरिद्रता होता है। दरिद्र वही है जिसमें लोभ है।
ऐसे सोच के आधार पर सभी का जीवन सार्थक हो ही नहीं सकता। सभी टाटा, बिड़ला, अम्बानी हो नहीं सकते, सभी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, ऊॅंचे पदाधिकारी, बड़े वैज्ञानिक, इन्जीनियर, डाक्टर आदि बन नहीं सकते। फिर तो अधिकांश को निराशा ही हाथ लगेगी और अपना जीवन व्यर्थ जान पड़ेगा।
जब कि वास्तविकता यह नहीं है। केवल जीवन के महत्व एवं उसकी सार्थकता के प्रति दृष्टिकोण सही करना है। मानव सेवा संघ ने कहा कि बड़े-छोटे का कोई प्रश्न् ही नहीं है हर व्यक्ति का जीवन सार्थक एवं उद्देश्यपूर्ण सिध्द होगा यदि हम यह देखें कि क्या हमने अपने को उपयोगी बना लिया है। हम उपयोगी कैसे होते हैं:-
(1) सेवा द्वारा संसार के लिए
(2) त्याग द्वारा अपने लिए और
(3) प्रेम द्वारा प्रभु के लिए
इसे अपना कर अपने को उपयोगी बनाने में हम पूर्णतया समर्थ और स्वाधीन हैं। सेवा सेवा ही होती है कोई बड़ी या छोटी नहीं होती। निकटवर्ती जन समाज की यथाशक्ति क्रियात्मक सेवा करें और सद्भाव द्वारा सभी की भावात्मक सेवा करें।
अपने को उपयोगी बनाना ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है।
-मानव सेवा संघ दर्शन पर आधारित एवं उध्दरित
मानव जीवन की सार्थकता क्या है,इसी बात को पूजनीया माँ अमृतानन्दमयी ने अपने ढंग से कहा है। वर्ष 2006 में वह लखनऊ आयी थीं तब एक पत्रिका प्रकाशित हुई थी जिसमें उनका सन्देश छपा था उसमें उन्होंने कहा है कि ''हम शरीर स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम करते हैं। व्यायामशाला जाकर वजन उठाते हैं। लेकिन हृदय को व्यायाम देना भूल जाते हैं। हृदय का व्यायाम दुखित और पीड़ित लोगों को उनके स्तर से उठाने में, उनकी सेवा में है।''
''हमारी आखों की सुन्दरता काजल की रेखा में नहीं है, वरन् दूसरों में अच्छाई देखने में है और दुखियों के प्रति करुणामय दृष्टि में है। कानों की सुन्दरता सोने की बालियों में नहीं वरन् दूसरों का कष्ट धैर्यपूर्वक सुनने में है। हमारे हाथों की सुन्दरता सोने की अंगूठी पहनने में नहीं वरन् सत्कर्म करने में है।''
''हमें जीवन में कृतज्ञता का भाव विकसित करना चाहिए, हम संसार के समस्त प्राणियों के ऋणी हैं जिन्होंने हमारे विकास और पोषण में किसी न किसी रूप में सहायता दी है और हमें इस अवस्था तक पहुँचाया है। प्रकृति हमारी माता है और हमें माता के प्रति अपना कर्तव्य नहीं भूलना चाहिए।''
''हमें अपने भाई-बहनों की दु:खभरी पुकार अनसुनी नहीं करनी चाहिए। जितना भी हो सके हमें उनका दु:ख कम करने का प्रयत्न करना चाहिए। करुणा करने के लिए कोई बड़े पद या बहुत धन की आवश्यकता नहीं है। एक प्यार भरा शब्द एक करुणाकारी दृष्टि,एक मुस्कान,कोई छोटी सी सहायता किसी गरीब के जीवन में प्रकाश ला सकती है और हमारे जीवन में भी। हमारे जीवन का मूल्य इसमें नहीं है कि हमने क्या पाया, बल्कि इसमें है कि हमने क्या दिया। यदि हम किसी जीवन को थोड़ी देर भी सुख दे सकें तो यह एक बड़ी उपलब्धि है। ''
ऐसा ही उद्बोधन मेहेर बाबा का है-
''Real Happiness lies in making others Happy'' और जीवन का यही सार्थकता है।
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