-: साधन सूत्र-26 :-
एक ही अनेक रूपों में
एक ही अनेक रूपों में
बहुत वर्ष पुरानी बात है एक बार जब बह्मलीन संत परम पूज्य स्वामी कृष्णानन्द जी,अयोध्या में कनक-भवन से भगवान राम का दर्शन कर लौट रहे थे,तब अयोध्या में ही उनसे भेंट होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैंने पूछा कि आपके इष्ट तो कृष्ण भगवान है,भगवान राम का दर्शन करके आपको कैसा लगता है ? हमेशा मौन रहने के कारण कागज पर लिखा ''मुझे तो लगता है एन्टे कृष्णा,एन्टे भगवान (अपनी मूल मलायली भाषा में), अर्थात् यही मेरे कृष्ण है, यही मेरे भगवान है''
अनेक रूपों में एक ही ईश्वरीय सत्ता की विद्यमानता का इतना सहज और सरल निरूपण से प्रेति उद्गार :-
हे रे कान्हा!- तू ही तू तो है,तेरे सिवा कोई और नहीं कछु और नहीं। तू ने ही तो अपनी इच्छा से,अपने ही में,अपने से,अपने द्वारा,समस्त सृष्टि का निर्माण किया है,और तू ही तो अनेक रूपों में इसका लालन,पालन संचालन कर रहा है (गजेन्द्र मोक्ष पर आधारित) हे,कान्हा तुझ को तेरे अनेक नाम रूपों में शत् शत् प्रणाम।
हे,कान्हा!- तुझको तेरे निर्गुण निराकार रूप में शत् शत् प्रणाम,तुझको तेरे निर्गुण साकार रूप में शत् शत् प्रणाम,तुझको तेरे सगुण साकार रूप में शत् शत् प्रणाम।
हे,कान्हा!- तेरी निज स्वरूपा, नित्य संगिनी, आह्लादिनी शक्ति , श्री राधारानी जी के चरण कमलों में शत् शत् प्रणाम,
श्री राधारानी जी के साथ तेरी युगल छवि के चरण कमलों में शत् शत् प्रणाम,
हे,कान्हा!- श्री राधारानी जी के साथ अपनी युगल छवि के श्री चरणों में अनन्य अविरल भक्ति और प्रेम प्रदान करो।
नोट:- भक्त वृन्द अपने अपने भाव के अनुरूप, कोई वात्सल्य भाव से, कोई सख्य भाव से, कोई दास भाव से तो कोई मात्र अपनत्व भाव से प्रभु को प्रेम करते हैं- इसलिये बै्रकेट खाली छोड़ दिया है।
हे कान्हा!- तुझ को तेरे परम कृपालु,परम उदार,परम ज्ञानी,ज्ञान के भंडार,विघ्ननाशक,विघ्नहर्ता,आदिगण देवता रूप गणेश भगवान को शत् शत् प्रणाम।
हे कान्हा!- तुझको तेरी करूणामयी,ममतामयी,कृपामूर्ति आदि अन्त रहित,आदि शक्ति,सर्वज्ञ,सर्वव्यापी,सर्व शक्तिमान मातृरूप माँ दुर्गा माँ के चरण कमलों में शत् शत् प्रणाम।
हे कान्हा:- तुझको तेरे औढरदानी,परम कृपालु,करूणासिन्धु,क्षणभर में करूणा से द्रवित होने वाले,परम उदार संहारकर्ता रूप शंकर भगवान को शत् शत् प्रणाम।
हे कान्हा:- तुझको तेरे सहज कृपालु,कृपानिधान,करूणासिन्धु,बिनु हेतु सनेही, भक्तवत्सल, शरणागतवत्सल, त्रेतायुग में अवतारी मर्यादा पुरूषोत्ताम रूप भगवान राम के श्री चरणों में शत् शत् प्रणाम।
हे कान्हा:- तुझको तेरे महाबली, महापराक्रमी, परमकृपालु, चिन्ताहरण, संकटहारी,भक्त शिरोमणी रूप,संकटमोचन हनुमान महाप्रभु को शत् शत् प्रणाम।
हे कान्हा:- तुझको तेरे अत्यधिक दयालु,दया करने में कभी आलस्य न करने वाले अतिशय दयालु (गजेन्द्र मोक्ष से)करूणासिन्धु, भक्तवत्सल, शरणागतवत्सल, शंख, चक्र, गदा पद्मधारी चतुर्भुज रूप विष्णु भगवान के चरण कमलों में कोटि कोटि नमन।
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