Monday, April 4, 2011

-: साधन सूत्र-27 :-

-: साधन सूत्र-27 :-

क्या सुख-भोग ही जीवन हैं

नहीं,सुख-भोग जीवन हो ही नहीं सकता,क्यों ? क्योंकि सुख हमेशा बना नहीं रह सकता। जीवन तो उसे कहते हैं जो नित्य,अविनाशी है,रसपूर्ण है।

सुख है क्या? सुख एक परिस्थिति मात्र है और परिस्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती-प्राकृतिक नियम के अनुसार निरन्तर बदलती रहती है। जहाँ सुख होगा,वहाँ दु:ख को भी होना ही है। संयोग का सुख है तो वियोग का दु:ख होगा ही,उससे बचा नहीं जा सकता। इसीलिये कहा है कि सुख रोकने पर भी चला जाता हैं और दु:ख बिना बुलाये चला आता है। या यूँ कहें कि कोई भी सुख को जाने से और दु:ख को आने से नहीं रोक सकता।

सुख,दु:ख है क्या? अनुकूल परिस्थिति सुख है,प्रतिकूल परिस्थिति दु:ख है। कामनापूर्ति सुख है और कामना अपूर्ति दु:ख है। ऐसी होता ही नहीं कि किसी की सभी कामनाएँ पूरी हों और किसी की एक भी कामना पूरी न हुई हो। सभी की कुछ कामनाएँ पूरी होती है और कुछ नहीं पूरी होती। राजा दशरथ की भी तो कामना पूरी नहीं हुई- वह राम को युवराज बनाना चाहते थे और हुआ क्या? राम वन को चौदह वर्ष के लिये गये।

यह जीवन का अकाटय सत्य है कि सुख और दु:ख का क्रम हर एक के जीवन में रहेगा ही। अत:यदि हम सुख-भोग को ही जीवन मान लेंगे तो दु:ख भी भोगना ही पड़ेगा।

तो प्रश्न उठता है कि सुख आया तो उसका भोग न करें तो क्या करें और क्या सुख दु:ख से अतीत भी कोई जीवन है? है,और उसकी प्राप्ति बहुत सहज है। सिर्फ दृष्टिकोण बदलना है जो हर एक के लिये सम्भव है।

मानव सेवा संघ की प्रथम प्रार्थना में है-

'' मेरे नाथ,..............................दु:खी प्राणियों के हृदय में त्याग का बल और सुखी प्राणियों के हृदय में सेवा का बल प्रदान करें....................................।''


मानव सेवा संघ दर्शन के अनुसार सुख-दु:ख मात्र साधन सामग्री है। उनका सदुपयोग करके हम वास्तविक रस रूप जीवन को प्राप्त करते है।

यदि हम सुख का भोग करेंगे अर्थात सुख में जीवन बुध्दि होगी तो दु:ख भोगना ही पड़ेगा। अन्यथा ''जो सुख का दास नहीं है वह दु:खी नहीं होता। इसलिये दु:ख से बचने के लिये सुख काल में सुख की वासना का त्याग अनवार्य है।''

सुख-दु:ख का सदुपयोग है क्या? दु:ख का भोग से बचने के लिये उन कामनाओं जिनकी आपूर्ति और जिन वासनाओं के कारण (जैसे नेत्रहीन है तो देखने की वासना) दु:ख हो रहा है उनका त्याग करना है और सुख का भोग न करके सुखद परिस्थिति का सदुपयोग सेवा में करना है। कोई भी सर्वांश में न तो दु:खी होता है और न हीं सर्वांश मे सुखी। अत: जिस अंश में दु:ख है तो त्याग अपनायें और जिस अंश में सुख है तो सेवा करें। यही सुख दु:ख का सदुपयोग है।

सुखद परिस्थिति में सेवा क्या है,इसके बारे में बड़ा भ्रम है। जब तक हम उदार नहीं होंगे सेवा हो ही नहीं सकती। उदार का यह अर्थ नहीं है कि मंदिर में पंखे टंगवा दिये और तीन पुश्त का ब्लेड पर नाम लिखवा दिया। प्याउ तो लगाया,परन्तु वहाँ अपने नाम का बड़ा बैनर लगा दिया।

उदारता का अर्थ होता है दु:खियों को देखकर करूणित होना और सुखियों को देखकर प्रसन्न होना। जब यह हमारे जीवन में उतर जायेगा तब हमसे स्वत: स्वभावत: सेवा होगी। शरीर का सुख बल है तो निर्बलों के काम आयेंगे-धन बल है तो निर्धनों के काम आयेंगे आदि।

स्वामी शरणानन्द जी एक बार अकेले ट्रेन से बलरामपुर जा रहे थे। उसी डिब्बे में एक मुसलमान जज साहेब बैठे थे। उन्हें जब मालूम हुआ कि स्वामी जी बलरामपुर जा रहे है। तो उन्होने उनसे पूछा कि गोण्डा में आप ट्रेन कैसे बदलेंगे? स्वामी जी ने सहज भाव से कहा कि मेरी आंखे नहीं है तो क्या,आपकी तो हैं। जज साहेब इतने प्रभावित हुए कि वे स्वयं उन्हें ले जाकर बलरामपुर की ट्रेन में बैठाये।


जिन साधनों से हम सेवा करते हैं उन्हें सेव्य की ही धरोहर मान कर करेंगे तब तो सच्ची सेवा होगी और अपने विकास के लिए हितकारी होगी अन्यथा हम कर्तिृत्व के अभिमान में फंस जायेंगे।

मानव सेवा संघ की एक सूक्ति इस प्रकरण में उल्लेखनीय है-''जो सुख को बनाये रखने का प्रयत्न करता है,सुख उससे छिन जाता है और जो सुख को बाँट देता है उसे आनन्द मिल जाता है।''

जब हम सुख-दु:ख का सदुपयोग करके सुख-दु:ख से अतीत जीवन में प्रवेश पाते है तब भगवान राम की तरह युवराज पद(सुख) से न हर्ष होता है और वनवास (दु:ख) से न विषाद। हम समता में रहते हैं।

इस प्रश्न् 'क्या सुख भोग ही जीवन है' का बहुत सहज, स्पष्ट और सुन्दर उत्तर मुंशी प्रेमचन्द्र द्वारा लिखी कहानी 'ईदगाह' के नायक बालक हामिद ने दिया है जिसने ईद के मेले में गुब्बारों,मिठाई और खिलौनों के प्रति बाल सुलभ आकर्षण पर विजय प्राप्त करते हुए अपनी दादी माँ के लिये लोहे का एक चिमटा खरीदा। क्यों? क्योंकि उसकी ऑंखों के सामने तो तवे पर रोटी सेंकते समय चिमटे के अभाव में दादी माँ की उंगलियों के जलने का दृश्य तैर रहा था। अधिकांश लोगों ने यह कहानी पढ़ी होगी। जिन्होने न पढ़ा हो वह अवश्य पढ़ें-जीवन का अर्थ और जीने की सही राह मिल जायेगी।

प्रश्नगत् शीर्षक का उत्तर इसमें भी निहित है कि हम सिर्फ अपने लिये जी रहें हैं,या दूसरों के लिये। अपने लिये जी रहें है तो भोग,दूसरों के लिये जी रहें है तो सेवा।

एक बात और,जिसने Joy of Sharing का रसास्वादन कर लिया है वह सुख का भोगी हो ही नहीं सकता।

-मानव सेवा संघ दर्शन पर आधारित एवं उध्दरित

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