Thursday, April 21, 2011

-: साधन सूत्र-33:-


-: साधन सूत्र-33:-

सेवा का अर्थ और स्वरूप


पर हित की दृष्टि से समाज में अनेकों लोग व्यक्तिगत रूप से, निजी संगठनों (Private institution) के माध्यम से अथवा गैर सरकारी संस्थाओं (NGO) के माध्यम से रोगियों,अशिक्षित वर्ग,शारीरिक रूप से अक्षम व निर्धनों आदि के लिए विभिन्न प्रकार के परोपकारी कार्य करते हैं। पर क्या उनमें से सभी लोग नि:स्वार्थ भाव से,करुणावशया समाज के प्रति दायित्व या समाज से जो पाया है वह ऋृण चुकाने के भाव से प्रेरित होकर ऐसे हितकारी कार्य करते हैं? अपने अन्दर झांक कर देखना होगा कि कहीं हमारे दिल के एक कोने में स्वार्थ भाव तो नहीं छिपा है कि इससे हमें ख्याति प्राप्त होगी,मान सम्मान मिलेगा,दानियों/परोपकारियों की लिस्ट में नाम आयेगा,जिनकी सेवा कर रहे हैं उनकी कृतज्ञता प्राप्त होगी या और कुछ नहीं तो वोट बैंक बनेगा या पुण्य कमायेंगे। यदि है तो ऐसी प्रवृति परोपकार और पुण्य भले ही हो,परन्तु सेवा की संज्ञा नही बनेगी।

सेवा उसे कहते है जो मानव कहें अथवा साधक कहें के द्वारा जीवन के वास्तविक लक्ष्य-नित्य अविनाशी रसरूप जीवन की अथवा योग-बोध-प्रेम की ईश्वरवादी हैं तो प्रभु प्रेम की-एक शब्द में अपने साध्य की प्राप्ति हेतु, उसके साधन निर्माण में सहायक हो।

अत: सेवा का अर्थ और उसका स्वरूप क्या है कि विवेचना उपयुक्त होगी।

ब्रह्मनिष्ठ,क्रांतदर्शी प्रज्ञा-चक्षु संत स्वामी शरणानन्द जी द्वारा प्रणीत मानव सेवा संघ की पुस्तक ''साधन-त्रिवेणी'' में 'सच्चा साघक कौन' शीर्षक के अन्तर्गत स्वामी जी की वाणी है:-

''अब सेवा का अर्थ क्या है? सेवा का अर्थ है कि जिसके बदले में हम सुख का भोग न करें। जैसे-आपने कोई सेवा की और मन में ऐसा प्रतीत हुआ कि हम बड़े उदार आदमी हैं। हमने बड़ी सेवा की है। यह किया,वह किया,अब आपने इससे बड़ा सुख लिया तो सेवा नहीं भोग हो गया।"

''.......सेवा होती है दूसरों के हित के लिये- अगर हम सुख का भोग करेंगे तो मोह और आसक्ति में आबध्द हो ही जायेंगे। अगर सेवा करेंगे तो बोध और प्रेम से अभिन्न हो जायेंगे।"

''सेवा कैसे करनी चाहिए इस सम्बन्ध में भी विचार करना चाहिए। सामर्थ के अनुसार विवेक के अनुसार सेवा करनी है। ज्ञान और सामर्थ्य के अनुसार ही सेवा की जाती है।"

''ज्ञान विरोधी सेवा करनी नहीं है और सामर्थ्य विरोधी सेवा कर ही नहीं सकते आप। सेवा का अर्थ होता है अपना सुख बाँटना। किसी की आवश्यकता को पूरा करना तो अपने हाथ में है नहीं,अपना सुख्या बाँटना हाथ में है। तो हमारने पास जो सुख की वस्तु हो-शरीर का सुख है तो शरीर से सेवा करना मन से सद्भाव रखना,बुराई रहित होना। यह सेवा कहलाती है। मन,वाणी,कर्म से अगर हम बुराई रहित हो जाएँ,तो यह विश्व की सेवा कहलाती है और ज्ञान और सामर्थ्य के अनुसार दूसरों के काम आ जाएँ,यह समाज सेवा कहलाती है और यदि अचाह हो जाएँ तो यह अपनी सेवा कहलाती है। यदि हम प्रभु की प्रियता प्राप्त करलें तो यह प्रभु की सेवा कहलाती है।"

हममें से बहुत लोग शरीर बल,धन बल,बुध्दि बल अथवा परिस्थिति वश औरों की अपेक्षा कम समर्थ होते हैं। ऐसे लोगों के लिए स्वामी की नीचे प्रस्तुत वाणी बहुत उत्साहवर्धक है:-

''सेवा में यह नहीं कहा जाता कि जिसके पास विशेष सामर्थ्य होगी उसकी सेवा का विशेष फल होगा और अल्प सामग्री से जो सेवा की जायेगी उसका फल अल्प होगा। ऐसा नहीं होता। सेवा का फल समान होता है। चाहे किसी तृषावन्त (प्यासे) को अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक गिलास पानी पिला दो और चाहे सम्पत्तिशाली होकर वाटर वर्कस बना दो। चाहे एक विद्यार्थी की सेवा कर दो और चाहे एक विश्वविद्यालय बनवा दो। इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता।"

एक दृष्टान्त पर्याप्त होगा, इसे समझने के लिए महात्मा गाँधी के आश्रम में एक कुष्ठ रोगी रहा करते थे। प्रात:कालीन टहलने के उपरान्त गाँधी जी स्वयं अपने हाथों से उनके घावों को साफ करके मरहम पट्टी करते थे। केवल यही नहीं,वे आश्रम के शौचालयों की सफाई में भी सहयोग करते थे।

सेवा दो प्रकार की होती है-क्रियात्मक और भावात्मक। इस बारे में अर्थात् सेवा के स्वरूप के बारे में स्वामी जी ने कहा है कि-

''सुखमय परिस्थिति में आपको क्रियात्मक सेवा करनी चाहिए और दु:खमय परिस्थिति में भावत्मक सेवा करनी चाहिए। जो क्रियात्मक सेवा का फल होता है वही भावात्मक सेवा का फल होता है। लेकिन आप यह कहें कि सुखमय परिस्थिति होगी तो हम बहुत सा दान करेंगे,बहुत सा काम करेंगे,उससे हमें बड़ा लाभ होगा। तो बड़ा लाभ नहीं होगा। लाभ उतना ही होगा जितना अल्प से होगा।"

विशेष महत्व का है:-

"आप जानते हैं कि बचने का क्या अर्थ होता है? जो न कर सकें, उसको तो करने की सोचें और जो कर सकें उससे जान बचायें। क्या बतायें महराज! धन होता तो, दान दे देते! हमने कहा भले आदमी,उसमी से कितना दे दिया जो पास में है? जो है,उसमें से कितना दे दिया।"

सेवा करने के लिए क्या बात अपेक्षित है, इसको स्वामी जी ने इस प्रकार स्पष्ट किया है:-

''अब कोई यह कहे कि राग के बिना हम अपने प्रियजनों की सेवा कैसे करेंगे? तो कहना होगा कि सेवा करने के लिए राग अपेक्षित नहीं है,अपितु उदारता की अपेक्षा है। कारण कि,उदारता आ जाने पर पराया दु:ख अपना दु:ख बन जाता है और फिर अपना सुख वितरण करने में लेश मात्र भी संकोच नहीं रहता। इतना ही नहीं,सुख भोग की आसक्ति का अन्त हो जाता है। यही सेवा का वास्तविक सार्थकता है। सेवा का अन्त किसी वस्तु, पद आदि की प्राप्ति में नहीं है। सेवा का अन्त तो त्याग में और त्याग का अन्त प्रभु-प्रेम में होता है।"........

.....''वास्तविक सेवा क्रियात्मक रूप से भले ही सीमित हो,किन्तु भावरूप से असीमा ही होती है। क्योंकि सेवा का जन्म ही होता है स्वार्थ भाव के मिट जाने पर। अर्थात् रोग रहित हो जाने पर, जिन साधनों से क्रियात्मक सेवा की जाती है,वे सीमित ही होते हैं। इस कारण सेवक का कर्म सीमित होता है। किन्तु जिस सर्वहितकारी सद्भावना से सेवा की जाती है, वह भाव असीम ही होता है।"

'' यह नियम है कि जो कर्म जिस भाव से किया जाता है। अन्त में कर्ता उसी भाव में विलीन हो जाता है। इस दृष्टि से सेवक का सीमित कर्म भी सेवक को असीम प्रेम से अभिन्न कर देता है।"

प्रथम पृष्ठ पर सेवा को जीवन के लक्ष्य (साध्य) की प्राप्ति हेतु साधन-निर्माण में सहायक कहा गया है। इस बिन्दु पर स्वामी जी का कथन बड़ा स्पष्ट है-

''मानव जीवन में सेवा का व्रत एक महत्वपूर्ण साधन है क्योंकि सेवा प्रेम का क्रियात्मक रूप है और त्याग प्रेम का विवेकात्मक रूप है। प्रेम तत्व में ही जीवन की पूर्णता है। जब तक प्रेम तत्व से अभिन्नता नहीं होती तब तक जीवन पूर्ण नहीं होता। प्रेम तत्व की प्राप्ति के लिए सेवा और त्याग साधन है। सेवा के बिना और त्याग के बिना प्रेम की प्राप्ति नहीं होती। तो दु:ख का प्रभाव हमें त्याग की प्रेरणा देता है और सुख हमें सेवा की प्रेरणा देता है।"

सेवा का अर्थ तथा स्वरूप को और स्पष्ट करने के लिए स्वामी जी ने इस प्रकार कहा है-

''सेवा का आरम्भ जो होता है वह बुराई-रहित होने से, मध्य में सुखद घड़ियों में यथाशक्ति भलाई से और अन्त में अचाह होने से। अगर भलाई का फल चाहेगा तो सेवा नहीं हो सकती; बुराई रहित नहीं होगा तो सेवा नहीं हो सकती। तो भलाई का फल मत चाहो और बुराई रहित हो जाओ यही तो सेवा का स्वरूप है। सभी के प्रति सद्भाव यह सेवा है,यथाशक्ति सहयोग यह सेवा है।.................. ''लेकिन दु:ख की बात तो यह है कि कुछ लोग सोचते हैं कि पैसा खर्च कर दो सेवा हो गई। कुछ लोग समझते हैं कि शरीर से कार्य कर दो तो सेवा हो गई। कर्म में और सेवा में भेद है। कर्म अपने सुख की भावना से प्रेरित होकर किया जाता है और सेवा पर-हित की दृष्टि से की जाती है। तो जो सभी का हित चाहता है वह सेवा कर सकता है।"

स्वामी जी ने एक और बात के प्रति सचेत किया जो संक्षेप में यह है कि साधन के साथ-साथ असाधन भी होगा तो बात नहीं बनेगी। जिस साधन से सेवा करें वह न्यायपूर्वक अर्जित हो अन्यथा वह उसी प्रकार का हो जायेगा जैसे एक तरफ तो गलत धंधा करके धन बटोरा और दूसरी ओर मंदिर धर्मशाला आदि बनवा दिया। पाप-पुण्य का लेखा-जोखा भले ही बराबर होता रहे पर यह सेवा की संज्ञा में नहीं आयेगा।

अन्त में सारे कथन का सारांश के रूप में स्वामी जी के ही शब्दों में-

''क्रियात्मक सेवा निकटवर्ती प्रिय जनों की करो और भावात्मक सेवा सारे संसार की करो। किसी का बुरा मत चाहो, यह भावात्मक सेवा हो गई और यथाशक्ति किसी की मदद कर दो यह क्रियात्मक सेवा हो गई। यथाशक्ति किसी की सहायता कर दी,यह क्रियात्मक सेवा हो गई। किसी को बुरा मत समझो,यह भावात्मक सेवा हो गई। बुराई न करना,यह क्रियात्मक सेवा हो गई। बुराई न चाहना, यह भावात्मक सेवा हो गई।"

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