-: साधन सूत्र-31 :-
जीवन में अशान्ति से छुटकारा-एक अन्य दृष्टि-कोण
जीवन में अशान्ति से छुटकारा-एक अन्य दृष्टि-कोण
साधन-सूत्र 30 में यह उल्लेख किया गया है कि जीवन में अशान्ति के मूल में देहाभिमान है जो देह से तादात्म्य का परिणाम है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस मान्यता को दृढ़तापूर्वक अपनाएँ कि 'मैं' शरीर नहीं हूँ और शरीर मेरा नहीं है। परन्तु यदि कोई यह कहे कि मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि ' मैं शरीर नहीं हूँ-इससे कुछ अलग हूँ,' तो ऐसी स्थिति में भी शरीर और संसार के सम्बन्ध में सोच बदलने से काम बन जायेगा। इसके बारे में परम संत स्वामी शरणानन्द जी का कथन प्रस्तुत है।
''....शरीर आदि से तद्रूप होने पर तो विश्व का दर्शन होता है। अथवा यो कहो कि शरीर उसी विश्व रूपी सागर की एक बूँद जान पड़ता है, और कुछ नहीं। शरीर और विश्व का विभाजन सम्भव नहीं है।............शरीर से तद्रूप होने पर मैं का अर्थ समस्त विश्व हो जाता है.............।"
'' क्या विश्व के साथ एकता होने वाली मान्यता हमारे जीवन में कुछ अर्थ रखती है ? यदि रखती है,तो कहना होगा कि जिस प्रकार हम समस्त विश्व से उपेक्षा-भाव रखते हैं,उसी प्रकार हमें शरीर से भी उपेक्षा रखनी होगी। अथवा जिस प्रकार शरीर के प्रति आत्मीयता रखते हैं,उसी प्रकार समस्त विश्व के प्रति आत्मीयता करनी होगी। शरीर के प्रति उपेक्षा होने पर भी मोह जैसी कोई वस्तु शेष नहीं रहती और समस्त विश्व के प्रति आत्मीयता होने पर सीमित प्यार जैसी कोई वस्तु शेष नहीं रह सकती। मोह तथा सीमित प्यार का अन्त होते ही अविवेक तथा सब प्रकार के राग का अन्त स्वत: हो जाता है। अविवेक का अन्त होते ही नित्यज्ञान से अभिन्नता और राग का अन्त होते ही नित्य-योग की प्राप्ति स्वत: हो जाती है।"
आगे स्वामी जी ने बाताया है कि ''मैं और विश्व एक है,यह मान्यता भी साधनरूप मान्यता हो सकती है।......विश्व से एकता स्वीकार करते ही सामूहिक सुख-दु:ख अपना सुख-दु:ख हो जाता है,जो हृदय में करुणा और प्रसन्नता प्रदान
करने में समर्थ है। करूणा,भोग-प्रवृत्ति को और प्रसन्नता,भोग-वासनाओं को खा लेती है,ऐसा होते ही समस्त कामनाओं का अन्त हो जायेगा। कामनाओं का अन्त होते ही निर्दोषता आ जायेगी और गुणों का अभिमान गल जायेगा.....।
इस प्रकार ऐसे व्यक्ति को भी वही जीवन प्राप्त होगा जो उस व्यक्ति को मिलता है जिसकी मान्यता है कि ''मैं शरीर नहीं हूँ और शरीर मेरा नहीं है।'' और उस जीवन में अशान्ति होने का प्रश्न ही नहीं है।
नोट 1: ऊपर जो शब्द 'अविवेक' आया है उसका अर्थ है विवेक का अनादर। विवेक का अनादर ही अविवेक है।
नोट 2: नित्य ज्ञान जो शब्द आया है उसका अर्थ निम्नलिखित से स्पष्ट हो जायेगा:-
''इन्द्रियों का ज्ञान पूरा ज्ञान नहीं है, अल्प ज्ञान है और बुध्दि का ज्ञान भी अनन्त ज्ञान नहीं है,सीमित है। इन्द्रिय ज्ञान से बुध्दि-ज्ञान भले ही विशेष हो,परन्तु अविवेक का अन्त होने पर जिस ज्ञान से अभिन्नता (total identity) होती है,वह तो अनन्त और नित्य ज्ञान है,सीमित तथा परिवर्तनशील नहीं।"
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