Friday, April 8, 2011

-: साधन सूत्र-29 :-

-: साधन सूत्र-29 :-

दु:ख है क्या


वास्तव में कामना अपूर्ति दु:ख है और कामना पूर्ति सुख है। सुख दु:ख परिस्थिति मात्र है-अनुकूल परिस्थिति सुख है और प्रतिकूल परिस्थिति दु:ख है। यहाँ चर्चा केवल दु:ख की,की जा रही है।

हम सभी के जीवन में किसी न किसी अंश में कभी न कभी दु:ख अनिवार्य रूप से आता ही है,इसलिये यह प्रश्न् उठता है कि आखिर दु:ख है क्या? जब वह हमारे जीवन में आता है तो हम विह्नल हो जाते हैं,अधीर होते हैं और अपने को अभागा कहते है। भाग्य को कोसते है या ईश्वर को कोसते हैं-उन्हें निष्ठुर और हृदयहीन कहते हैं।

परन्तु भाग्य स्वयँ में तो कुछ है नहीं। हमारे कर्मों से प्रारब्ध कहें या भाग्य कहें,बनता है। इसलिये भाग्य का क्या दोष है? दोष तो हमारा और हमारे कर्मों का ही है।

कभी कभी लोग ऐसा भी कहते हैं कि हमने तो जाने अनजाने कोई गलत कार्य नहीं किया,किसी को सताया नहीं-तो फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ। यहाँ हमसे भूल हो जाती है कि हमारा प्रारब्ध केवल इसी जन्म के कर्मों का फल नहीं,बल्कि पूर्व के जन्म जन्मान्तर के संचित कर्मों का फल है। उसी के अनुसार अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ हमारे जीवन में आयेंगी ही।

यदि हम दु:ख को ईश्वर द्वारा प्रदत्त सजा कहें,तो वह भी उचित नहीं है। ईश्वर ने अपनी मौज में सृष्टि बनायी और उसका एक विधान बना दिया। उसी विधान से समस्त सृष्टि संचालित हो रही है। प्रभु मंगलकारी हैं और उनका विधान भी मंगलमय है-इसलिये न तो उन्हें दोष दे सकते हैं और न ही उनके विधान को।

मानव सेवा संघ दर्शन के प्रतिपादक ब्रह्मनिष्ठ,क्रांत-दर्शी,प्रज्ञा-चक्षु संत स्वामी शरणानन्द जी ने इस बात को इस प्रकार स्पष्ट किया है ''कुछ लोग सुख और दु:ख को कर्मों का फल मानते हैं। परन्तु वास्तव में कर्मों का फल सुख दु:ख नहीं है। कर्मों के फल के रूप में तो परिस्थिति प्राप्त होती है। उनमें सुख और दु:ख तो मनुष्य के भावानुसार होते हैं।''

''विवेकशील मनुष्य भयंकर परिस्थिति में दु:खी नहीं होता अपितु उसको अपनी उन्नति का हेतु समझकर उसका सदुपयोग करता है तथा सब प्रकार की परिस्थितियों को परिवर्तनशील अनित्य और अपूर्ण समझकर परिस्थितियों से ऊपर का जीवन प्राप्त करने के लिये,उनसे असंग हो जाता है।''

उन्होंने दु:ख के सम्बन्ध में विशेष रूप से एक नवीन सिध्दान्त बताया। उन्होंने दो अलग-अलग शब्दों का प्रयोग किया-दु:ख का भोग और दु:ख का प्रभाव ।

जीवन में दु:ख आया और उससे हम विकल हो गये,अधीर हो गये,अपने को अभागा कहने लगे और ईश्वर पर दोष मढ़ने लगे तो यह ''दु:ख का भोग'' है और यदि उसके आने पर उसकी यथार्थता और सृष्टि का अनिवार्य स्वरूप समझ कर सजग और सचेत हो जाते हैं तो इसे ''दु:ख का प्रभाव'' कहा है। अनिवार्य स्वरूप यों कि उदाहरण के लिये यदि किसी का संयोग है तो आगे पीछे किसी न किसी समय वियोग होगा ही-किसी का शरीर अमर नहीं होता। सृष्टि में जो कुछ भी उत्पन्न होता है उसका नाश भी होता ही है।

यदि दु:ख के भोगी हैं तो दु:ख अभिशाप है। पर यदि उसके प्रभाव को अपनाते हैं तो वह वरदान है। इससे हमारा उत्तारोत्तार विकास होता है और सुख-दु:ख से अतीत जीवन में प्रवेश पाते हैं। दु:ख के मांगलिक पक्ष को ''दु:ख का प्रभाव'' कहा है।

इसे सुनकर सामान्यत:हम चौंकेंगे और कहेंगे कि दु:ख वरदान या मांगलिक कैसे हो सकता है। परन्तु है यह सत्य।

स्वामी शरणानन्द जी जब नौ(9)वर्ष के बालक थे तो उनकी दोनों ऑंखें चली गईं। घोर दु:ख हुआ। उनके मन में प्रश्न् उठा कि क्या ऐसा भी कोई सुख है जिसमें दु:ख नहीं होता। उत्तार मिला-हाँ साधुओं का जीवन ऐसा होता है। बस साधु होने की धुन चढ़ गई-उन्नीस(19) वर्ष की आयु में गृह त्याग कर अपने सद्गुरू के साथ चल दिये और विधिवत सन्यास ले लिये।

ऑंखों की रोशनी जाने का जो दु:ख आया वही उनके जीवन का turning point बन गया। उन्होंने स्वयँ अपना कल्याण तो किया ही अनगिनित लोगों को जीवन की सही राह दिखा कर उनका कल्याण किया और उनके शरीर त्याग के बाद भी उनके द्वारा प्रतिपादित दर्शन अनेकों अनेकों लोगों का कल्याण कर रहा है और युगों युगों तक करता रहेगा।

उन्होंने 'दु:ख का प्रभाव' नाम से एक पुस्तक लिखवाया जो मानव जो मानव सेवा संघ वृन्दावन द्वारा प्रकाशित है। हम जैसे लोगों के हितार्थ परमपूज्या माँ दिव्यज्योति(देवकी बहिन जी) ने,जिन्होंने मानव सेवा संघ दर्शन को पूर्णरूपेण आत्मसात् किया,संक्षेप में ''दु:ख-एक विवेचन'' नाम से व्याख्या किया है।


जब कोई दु:ख को आने से रोक नहीं सकता,वह जब आना है तब आयेगा ही,कोई बच नहीं सकता,तो बुध्दिमत्ता इसी में है कि दु:ख के प्रभाव को अपनाया जाय।

-मानव सेवा संघ दर्शन पर आधारित







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