Wednesday, April 27, 2011

-: साधन सूत्र-36 :-

-: साधन सूत्र-36 :-

'मैं' हूँ क्या?


पिछले कुछ साधन-सूत्रों में इस बात की चर्चा हो चुकी है कि 'मैं' देह नहीं हूँ और देह मेरी नहीं है। कोई कहे कि ठीक है,मैंने समझ भी लिया और स्वीकार भी कर लिया कि 'मैं' देह नहीं हूँ,पर यह प्रश्न् करना स्वाभाविक है कि देह नहीं हूँ तो फिर हूँ क्या?

पारम्परिक व्याख्याओं में इस सम्बन्ध में आत्मा-परमात्मा अथवा ब्रह्म-जीव की चर्चा होती है। परन्तु 'मैं' आत्मा हूँ या 'मैं' जीव हूँ का अनुभव नहीं है, सुनी हुई बात है। इसके विपरीत शरीर,परिस्थिति, अवस्था से परे 'मैं' कुछ हूँ इस मैंपन का भास का अनुभव हर व्यक्ति को होता है।

मानव सेवा संघ दर्शन में इस प्रकरण में तीन शब्दों का प्रयोग होता है,-यथा-'यह', 'मैं', और 'वह'। 'वह' को ही 'है' नाम से भी कहा जाता है। 'यह' उसे कहते हैं जो पर-प्रकाश्य है; जिसकी प्रतीति होती है। जो अविनाशी परम-सत्ता (किसी भी नाम से पुकारे-ईश्वर-परमात्मा-ब्रह्म) जो नित्य है उसी को 'है' कहते हैं। वही सर्व प्रतीतियों का प्रकाशक है, उसे ही 'वह' भी कहा है।

ब्रह्मनिष्ठ संत स्वामी शरणानन्द जी द्वारा प्रणीत मानव सेवा संघ के दर्शन में इस विषय की कैसे व्याख्या की गई है,नीचे प्रस्तुत है-

"मैं" ,'यह' और 'वह' तीनों सत्ताओं में यह और वह का सैध्दान्तिक विवेचन गौण रखकर 'मैं' का दार्शनिक विश्लेषण प्रमुख रूप से किया गया है। 'मैं' को ही 'यह' की प्रतीति होती है,'मैं' में ही 'वह' की जिज्ञासा और प्रिय-लालसा जगती है। अत: मानव सेवा संघ के दर्शन का प्रतिपादन व्यक्ति के अह्म रूपी अणु के अध्ययन से आरम्भ किया जाता है। असाधन-काल में व्यक्ति को जगत् सत्य और सुख रूप प्रतीत होता है। साधन-काल में उसी व्यक्ति के अह्म रूपी अणु में जब परिवर्तन आता है तो 'यह' की सत्यता और सुख-रूपता मिट जाती है। साधक जगत के आकर्षण से मुक्त होकर निर्मम,निष्काम होकर प्राप्त परिस्थिति का साधन-सामग्री के रूप में उपयोग करने लगता है। उसी साधक में जब शरीरों से असंग होने की सामर्थ्य आ जाती है,तब प्रतीत होने वाला जगत् नहीं रहता। 'यह' की प्रतीति लुप्त हो जाती है और 'वह' की विद्यमानता प्रत्यक्ष हो जाती है।........मानव सेवा संघ के प्रणेता ने मानव-दर्शन में 'मैं' के विवेचन को ही प्रधान अनिवार्य, उपयोगी और सर्वाधिक व्यवहारिक माना है। संघ के दर्शन के अनुसार-अह्मरूपी अणु में जगत् का बीज भी है,सत्य की खोज भी है और परम-प्रेम की लालसा भी है। तीनों ही तत्व अह्म रूपी अणु के अनिवार्य (component parts) पहलू हैं।

'मैं' क्या है,इसका विवेचन संघ के दर्शन में एक नवीन ढंग से हुआ है जो नीचे प्रस्तुत है:-

" 'मैं ब्रह्म हूँ','मैं अमर हूँ' यह वेदवाणी सुनी हुई है। 'मैं','यह' नहीं हूँ,यह जीवन को अनुभव है। जीवन के अनुभव को पहले मानो,तब वेद-वाणी सिध्द होगी। जीवन के अनुभव को माने बिना वेद-वाणी अपने लिए अनुभव सिध्द नहीं होगी। 'मैं' को 'यह' की प्रतीति हो रही है। जिसको प्रतीति हो रही है,वह स्वयं प्रतीति नहीं है, अर्थात् 'मैं' दृश्य नहीं हूँ। 'मैं' को ब्रह्म अथवा आत्मा अथवा जीव अथवा शरीर मानकर 'मैं' के स्वरूप की खोज भ्रममूलक है। हमें विचार करना चाहिए कि जो कामना-जनित विकारों में आबध्द है उसी में निर्विकारता की मांग है। निर्विकार में निर्विकारता की मांग हो नहीं सकती और पर-प्रकाश्य अनात्मा में आत्मा की जिज्ञासा हो नहीं सकती। जिसमें आत्मा की जिज्ञासा है, जिसमें ब्रह्म की खोज है वह स्वयं न ब्रह्म हो सकता है न आत्मा। अनात्मा की ममता और आत्मा की जिज्ञासा जो अपने में अनुभव कर रहा है,जिसने ममता की निवृत्ति और जिज्ञासा पूर्ति को अपना लक्ष्य बनाया है वह निर्विकार आत्मा अथवा पर-प्रकाश्य अनात्मा हो ही नहीं सकता। अत: 'मैं' न 'यह' है और न 'वह' है। मैं क्या है? इस समस्या पर विचार करने से स्पष्ट विदित होता है कि समस्या आत्मा और अनात्मा में नहीं है, समस्या ब्रह्म और जगत में नहीं है,समस्या उसी में है जो आत्मा-अनात्मा से मिलकर प्रकाशित होता है। आत्मा-अनात्मा से वही मिल सकता है जो न आत्मा है और न अनात्मा। उसी को सीमित अह्म भाव तथा 'साधक' के नाम से सम्बोधित करना चाहिए। वही 'मैं' है।....... मानव सेवा संध दर्शन के अनुसार 'मैं' कामना, जिज्ञासा और लालसा का पुंज है।"

नोट:- यदि कोई इस विषय को और विस्तार से समझना/पढ़ना चाहे वह मानव सेवा संध की पुस्तक ''मैं की खोज'' देख सकते हैं।



No comments:

Post a Comment