Monday, April 25, 2011

-: साधन सूत्र-34 :-

-: साधन सूत्र-34 :-

मानव सेवा संघ दर्शन में साधना का अर्थ और साधना-प्रणाली

साधना क्या है? साधना उसे कहते हैं जो साधक को साध्य से मिला दे। दूसरे,साधना की नहीं जाती बल्कि साधक के जीवन में इसकी अभिव्यक्ति होती है। साधना में श्रम और पराश्रय अपेक्षित नहीं है। यदि श्रम और पराश्रय अपेक्षित होता तो यह सबको समान रूप से उपलब्ध नहीं होता क्योंकि सब इसमें समान रूप से समर्थ नहीं होते। फिर वह साधना, साधना कैसी जो सबके लिए समान रूप से सुलभ न हो।

साधक-साधन-साध्य की सूक्ष्म चर्चा साधन-सूत्र-15 में की गयी थी। यहाँ थोड़ा विस्तार से प्रस्तुत है।

मानव सेवा संघ की परम कोटि की साधिका माँ दिव्य ज्योति (देवकी बहन) के दो लेख-''साधना कया है'' और ''मानव सेवा संघ की साधना-प्रणाली नाम से मानव सेवा संघ रजत ज्यन्ती स्मारिका में प्रकाषित हुए थे। उन्हीं से कुछ उध्दरण प्रस्तुत हैं जो इस विषय पर सहज और सटीक ढंग से प्रकाश डालेंगे।

''साधना साधक का जीवन और साध्य का स्वभाव है।..... साधक उसे कहते हैं जिसे अपनी वर्तमान दुर्बलताओं का पता हो, जो अपनी मांग को जानता हो और मांग की पूर्ति के लिए अपने दायित्व को पूरा करने में तत्पर हो।.....मांग की पूर्ति के लिए जो दायित्व साधक पर है उसको पूरा करना साधना का आधार है। मानव सेवा संघ के अनुसार साधना ऊपर से भरी नहीं जाती,प्रत्युत सत्संग के फलस्वरूप व्यक्ति के व्यक्तित्व में ही साधना की अभिव्यक्ति होती है। जैसे,जो सदा के लिए साथ नहीं रह सकता उसकी ममता और कामना रखना भूल है। मानव का निज अनुभव है कि दृश्य जगत की कोई भी वस्तु, व्यक्ति,अवस्था,परिस्थिति सदा के लिए साथ नहीं रह सकती। अत: इनकी ममता और कामना रखना भूल है। भूल को भूल जानकर उसका त्याग कर देना सत्संग है। ममता और कामना का त्याग करने से व्यक्तित्व में निर्विकारता आती है। यह निर्विकारता साधना है। बिना देखे,बिना जाने परमात्मा से आत्मीय सम्बन्ध की स्वीकृति से प्रिय की स्मृति जागृत होना साधना है। इस प्रकार भगवत-स्मृति,निष्कामता,निर्विकारता साधना है जो साधक के व्यक्तित्व में स्वत: ही अभिव्यक्त होती है।"

आगे बताया है कि ''जो साधना साधक में अभिव्यक्त होती है वह कभी खण्डित नहीं होती। वह साधना साधक को आत्मसात् करके साध्य की अभिन्न्ता में विलीन हो जाती है। साधना, साधक और साध्य के बीच भेद, भिन्नता और दूरी नहीं रहने देती।"

साधना के स्वरूप के सम्बन्ध में स्पष्ट किया है कि- ''साधना शरीर-धर्म नहीं है। यह साधक का स्व-स्वरूप और साध्य का स्वभाव है। साधक की अभिन्नता साधन से ही होती है,अर्थात् साधक साधना होकर साध्य से मिलता है। साधना माने क्या,साध्य की अगाध प्रियता। साधक का सम्पूर्ण अहम् साध्य की अगाध प्रियता में रूपान्तरित हो जाता है।''

ऊपर कहा गया है कि साधना शरीर धर्म नहीं है। उसी क्रम में आगे बताया गया है कि-

''साधना उसे नहीं कहते जो साधक को पराश्रित और पराधीन बना दे। जिस साधना से साध्य से अभिन्नता (मिलन अर्थात् Total identity) होती है वह साधना साधक के सूक्ष्माति-सूक्ष्म अहं का रूपान्तर है। इसलिए मानव सेवा संघ ने साधन करने की बात नहीं कही,'साधन-निर्माण' की बात कही। साधन-निर्माण का अर्थ क्या है?........ मानव सेवा संघ किसी भी विध्यात्मक साधना-प्रणाली का आग्रह या विरोध नहीं करता,परन्तु योग, बोध और प्रेम जो साधक मात्र के जीवन का लक्ष्य है उसकी अभिव्यक्ति के लिए मौलिक और अनिवार्य तथ्यों को अपनाने का परामर्श देता है। जैसे ईश्वरवादी साधक अपनी-अपनी रुचि के अनुसार साकार उपासना अथवा निराकार उपासना चाहे जैसा पसन्द करें कर सकते हैं। वे अपनी निष्ठा,अपनी पसन्दगी के अनुसार विध्यात्मक साधना में स्वाधीन हैं। परन्तु मानव सेवा संघ ने उपासना का अर्थ बताया-'साध्य से आत्मीय सम्बन्ध की स्वीकृति।' विश्वास-पथ के साधकों की साधना का मूल मंत्र है-जिस ईश्वर की सत्ता को आस्था,श्रध्दा,विश्वास के आधार पर स्वीकार किया गया,उससे आत्मीय सम्बन्ध को मानना और सब सम्बन्ध एक सम्बन्ध में,सब विश्वास एक विश्वास में विलीन कर देना अर्थात् अन्य सम्बन्धों तथा अन्य विश्वासों को छोड़ देना।......इस प्रकार सत्य की स्वीकृति के फलस्वरूप भगवत-स्मृति तथा अन्य की विस्मृति का अभ्यास नहीं करना पड़ता, यह सब स्वत: हो जाता है। मानव सेवा संघ ने इसी को भगवत्-भजन कहा है। साधक की सम्पूर्ण वृत्तियाँ इस स्मृति से एकाकार होकर साध्य के मिलन की उत्कट अभिलाषा का रूप धारण कर लेती हैं। इसको मानव सेवा संघ ने साधन-तत्व कहा है। साधक का अह्म प्रिय-मिलन की उत्कट अभिलाषा से भिन्न और कुछ नहीं रह जाता। तब उसी में उसका साध्य प्रकट होकर साधक को सदा-सदा के लिए अपना लेता है।"

''इस दृष्टि से विश्वास-पथ के साधक की साधना का मूल मंत्र है, साध्य के साथ आत्मीय सम्बन्ध की स्वीकृति। यह स्वीकृति शरीर धर्म नहीं है। यह स्वीकृति कोई अभ्यास या अनुष्ठान नहीं है। यह स्वीकृति साधक का स्वधर्म है।"

इस कारण इस बात पर बल दिया है-

''.......साधक...... जिस विध्यात्मक प्रणाली को स्वीकार करना चाहे कर सकता है, परन्तु 'स्व' के द्वारा साध्य से आत्मीय सम्बन्ध अवश्य स्वीकार करे,अन्यथा कोई भी विध्यात्मक साधना सजीव नहीं होगी।"
नोट-1: इस व्याख्या के दोनों विषय आपस में इतने जुड़े हैं कि इनके बीच कोई सीमा रेखा खींचना सम्भव नहीं है। इसलिए इनकी चर्चा में समिश्रण (overlapping) स्वाभाविक है।

नोट-2: ऊपर कहा गया है कि ''अर्थात् अन्य सम्बन्धों तथा अन्य विश्वासों को छोड़ देना।" इससे भ्रम न हो जाये इसलिए इसका तात्पर्य समझना आवश्यक है। जिन व्यक्तियों और वस्तुओं से सम्बन्ध माना है और उन पर विश्वास किया है-उन व्यक्तियों/वस्तुओं को छोड़ने की बात नहीं है। व्यक्तियों की सेवा और वस्तुओं का सदुपयोग करना है। उनसे माने हुए सम्बन्ध और उन पर विश्वास को छोड़ना है।

क्रियात्मक साधना के सम्बन्ध में यह बताया गया है कि-

''क्रियात्मक साधना अखण्ड नहीं हो सकती। शरीरों पर आधारित क्रियाओं के फलस्वरूप साधक के व्यक्तित्व में अलौकिक जीवन का अनुभव उद्भूत नहीं होता। क्रिया में जब साधक के अविनाशी ज्ञान और प्रेम का पुट रहता है तो आगे चलकर अविनाशी तत्व विकसित होते चले जाते हैं। उनकी सरसता में साधना का क्रियात्मक पक्ष गौड़ होता जाता है और अन्त में सब क्रियायें भाव में विलीन हो जाती हैं। तभी साधना सफल होती है।"

यह वास्तविकता कई बार दोहराई जा चुकी है कि साधना की नहीं जाती बल्कि साधक के व्यक्त्वि में इसकी स्वत: अभिव्यक्ति होती है। देव  की  बहन  जी  ने  'मानव सेवा संघ  की साधना-प्रणाली'  नामक व्याख्या में इसे पुष्ट करते हुए इस प्रकार कहा है-

''मानव सेवा संघ के अनुसार साधना की नहीं जाती, सत्संग के प्रभाव से साधना निर्मित होती है और व्यक्ति के व्यक्तित्व में से साधन-तत्व की अभिव्यक्ति होती है। साधक होने के लिए सत्संग करना अनिवार्य है। सत्संग क्या है? जीवन के सत्य को स्वीकार करना सत्संग है। जीवन का सत्य क्या है? देह मैं नहीं हूँ,'देह' मेरी नहीं है। यह जीवन का सत्य है। दृश्य-मात्र से मेरा नित्य सम्बन्ध नहीं है,यह जीवन का सत्य है। जिससे नित्य सम्बन्ध नहीं है, उसकी ममता और कामना के त्याग से अशान्ति और पराधीनता का नाश होता है,यह जीवन का सत्य है। प्राप्त सामर्थ्य के द्वारा पर-पीड़ा में हाथ बटाने से उदारता और करुणा का रस बढ़ता है जो अह्म की शुध्दि में हेतु है,यह जीवन का सत्य है। जिससे नित्य सम्बन्ध है,उस बिना देखे,बिना जाने परमात्मा में आस्था,श्रध्दा,विश्वास-पूर्वक आत्मीय सम्बन्ध स्वीकार करने से उस नित्य प्राप्त की प्रीति जागृत होती है,यह जीवन का सत्य है। अपने जाने हुए असत् के त्याग से असाधनों का नाश स्वत: होता है और जीवन के सत्य को स्वीकार करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में विद्यमान अलौकिक तत्वों का विकास होता है। मानव सेवा संघ में इन्हीं दो बातों को साधक का परम पुरुषार्थ बताया गया है।"

''साधक होने के लिए व्यक्ति को किसी बाह्य वस्तु,व्यक्ति,अवस्था, परिस्थिति की अपेक्षा नहीं है। व्यक्ति के व्यक्तित्व मं ही विद्यमान भाव-शक्ति,विचार-शक्ति और कार्य-क्षमता के आधार पर साधना का निर्माण होता है। कार्य-क्षमता के आधार पर साधना क्या है? प्राप्त बल का दुरुपयोग न करना एवं निकटवर्ती जन-समुदाय की यथाशक्ति क्रियात्मक सेवा करना साधना है। मन से,वचन से,कर्म से बुराई-रहित होकर सद्भाव-पूर्वक सभी को सहयोग देना कर्म-क्षेत्र की साधना है। इसका सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप है दु:खी मात्र के दु:ख से करुणित होना एवं सुखी मात्र के सुख से प्रसन्न होना। करुणा और प्रसन्नता उदारता है। उदारता साधन-तत्व है,इसी के आधार पर कर्तव्यनिष्ठ साधक को विश्व-प्रेम प्राप्त होता है।, जो साधना की सफलता है।"

''विचार-शक्ति के आधार पर दृश्य जगत में 'मेरा कुछ नहीं है' और 'मुझे कुछ नहीं चाहिए' ऐसा जानकर किये हुए सर्व हितकारी कर्म के फल तथा कर्तापन के अभिमान को छोड़ना साधना है। निर्मम,निष्काम होने से स्वत: ही शरीरों से असंगता होती है। अकिंचन अचाह होकर अप्रयत्नपूर्वक अहंकृति-रहित होना विचारक साधक की साधना है। असंगता से चिर-विश्राम और स्वाधीनता आती है; ये साधन-तत्व हैं, ये साधन तत्व व्यक्ति के व्यक्तित्व में से ही अभिव्यक्त होते हैं और इन्हीं के द्वारा साधक दिव्य-चिन्मय जीवन से अभिन्न हो जाता है।"

''भाव-शक्ति के आधार पर बिना देखे,बिना जाने, परमात्मा से आत्मीयता को स्वीकार किया जाता है। इस स्वीकृति से जो अपने ही में विद्यमान हैं,उसकी मधुर-स्मृति जागृत होती है। मधुर-स्मृति का जागृत होना विश्वासी साधक की साधना है। इस स्मृति के जागृत होते ही साधक के जीवन की निरसता का नाश होता है। प्रिय की मधुर-स्मृति विश्वासी साधक के सम्पूर्ण अह्म को प्रेम की धातु में रूपान्तरित कर देती है। विश्वासी साधक प्रेम होकर प्रेमास्पद से अभिन्न हो जाता है,यह उसकी साधना की सफलता है।"

''उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो गया कि मानव सेवा संघ ने व्यक्ति के व्यक्तित्व के तीनों पहलुओं पर आधारित तीन साधना प्रणाली का प्रतिपादन किया है। कार्य-क्षमता के आधार पर कर्तव्य-पथ,विचार शक्ति के आधार पर ज्ञान-पथ एवं भाव शक्ति के आधार पर भक्ति-पथ-इन तीनों ही साधन-प्रणालियों को समान रूप से महत्वपूर्ण माना गया है। किसी प्रणाली को सहज और किसी को कठिन नहीं माना गया है।"

''भाव, विचार और कर्म एक ही व्यक्तित्व के अनिवार्य पहलू (component parts) हैं। फलस्वरूप कर्तव्य-पथ,ज्ञान-पथ और भक्ति-पथ में परस्पर विरोध नहीं है,प्रत्युत तीनों ही एक दूसरे के सहायक हैं। कर्तव्य-पथ के साधक में सही प्रवृत्ति के बाद सहज निवृत्ति की शान्ति स्वत: अभिव्यक्त होती है। मानव सेवा संघ के सिध्दान्त में कर्तव्य-विज्ञान का उत्तर पक्ष योग बताया गया है। योग में बोध एवं बोध में प्रेम स्वत: अभिव्यक्त होता हैं। योग-बोध-प्रेम में जीवन की पूर्णता है। विचार-पथ की प्रणाली से भी वही सत्य मिलता है जो विश्वास पथ की प्रणाली से मिलता है।"

परन्तु जीवन में असाधन रहते हुए कोई भी प्रणाली सफलता प्रदान नहीं कर सकती क्योंकि-

''असाधन के साथ-साथ किया गया साधन सफल नहीं होता। इस कारण साधक-समाज को असाधनों के नाश का पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए,उदाहरणार्थ-बल का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए,विवेक का अनादर नहीं करना चाहिए,ईश्वर-विश्वास में विकल्प नहीं करना चाहिए, प्राप्त गुणों एवं साधन के फल का अभिमान लेकर अह्म को पोषित नहीं होने देना चाहिए,श्रध्दा में तर्क और तर्क में श्रध्दा नहीं मिलाना चाहिए। .........असाधन उत्पन्न करने वाली भूलों का त्याग कर देने पर साधक के लिए साधना सहज स्वाभाविक हो जाती है। असाधनों का त्याग ऐसी अपरिहार्य साधना है कि संघ के प्रणेता श्री महाराज जी ने अनेक स्थानों पर कहा है कि-साधना माने क्या? बुराई रहित होना।"

मानव सेवा संघ की साधना-प्रणाली की चर्चा करते हुए देवकी बहिन जी ने बताया है कि इसमें ''मूक-सत्संग विशेष महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मूक हो जाना अर्थात् कुछ न चाहना,कुछ न करना एवं अप्रयत्न हो कर अहंकृति-रहित होना।"

साधना के सम्बन्ध में देवकी बहिन जी ने एक विशेष बात कहा है जो बहुत ही मार्मिक है-

''साधना सम्बन्धी सबसे ऊॅंची और अन्तिम बात है साध्य से अभिन्न होने की तीव्र मांग की जागृति। श्री महाराज जी ने कहा है कि साध्य से मिलने के लिए अत्यन्त व्याकुल हो जाना सबसे बड़ी साधना है।"

देवकी बहिन जी के इन दोनों लेखों यथा-साधना क्या है-और मानव सेवा संघ की साधना-प्रणाली,में विस्तार से व्याख्या की गई है। यह चर्चा बहुत लम्बी न हो जाये,इसलिए कुछ खास-खास बिन्दुओं को ऊपर प्रस्तुत किया गया है।

जिस स्मारिका (पुस्तक) में ये लेख छपे थे, वह out of print है। विस्तार से इस व्याख्या को पढ़ने और समझने के इच्छुक पाठकों को दृष्टि में रखकर इन  दोनों  लेखों  की  फोटो प्रतियां संलग्नक (क) और (ख) के रूप में प्रस्तुत है।

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