-: साधन सूत्र-28 :-
साधन रूपी पारम्परिक प्रवृत्तिायों का मानव सेवा संघ दर्शन में अर्थ
प्रभु प्राप्ति अथवा अपने नित्य,अविनाशी,चिन्मय,रसरूप जीवन की प्राप्ति हेतु,साधना के रूप में कुछ प्रवृत्तिायों का नाम आता हैं। मानव सेवा संघ के दर्शन के अनुसार इस हेतु जो भी प्रवृत्तिा अपनायी जाये वह सब के लिये सहज और सुलभ हो। यदि उसमें श्रम और पराश्रय अपेक्षित होगा तो वह सबके लिये सहज नहीं होगा क्योंकि सबकी सार्मथ्य अलग-अलग होती है। इसके अतिरिक्त ऐसी साधना अखण्ड नहीं होगी। मानव सेवा संघ के अनुसार अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये हमारा पूरा जीवन ही साधनमय होना आवश्यक है। कुछ देर साधन ओर शेष समय असाधन,इससे काम नहीं बनने वाला।
मानव सेवा संघ के अनुसार साधन किया नहीं जाता अपितु साध्य की प्राप्ति हेतु साधक का पूरा जीवन ही साधनमय हो जाना आवश्यक है। जीवन के सत्य को 'स्व' द्वारा स्वीकार करने और विवेक के प्रकाश में अपनी जानी हुई बुराईयों को निकाल देने पर,साधक के जीवन में साधन की अभिव्यक्ति होती है। साधक साधन होकर साध्य से अभिन्न हो जाता है।
पारम्परिक ऐसे साधन प्रवृत्तिायों का अर्थ और स्वरूप मानव सेवा संघ के प्रणेता बह्मलीन संत,परमपूज्य स्वामी शरणानन्द जी ने समय समय पर साधकों के प्रश्न् के उत्तर में स्पष्ट किया है। उन्हीं का संकलन नीचे प्रस्तुंत है।
1. प्रश्न्- पूजा का क्या अर्थ है?
उत्तर- संसार को भगवान मानकर,उन्हीं की प्रसन्नार्थ संसार से मिली हुई वस्तुओं को संसार की सेवा में लगा देना पूजा है।
एक अन्य प्रश्नकर्ता के उत्तर में उन्होने बताया कि ''पूजा का वास्तविक अर्थ है-भगवान के नाते और उन्हीं की प्रसन्नता के लिये संसार की सेवा करना।''
इसी को इस प्रकार भी कहा है कि प्रभु के नाते किया हुआ प्रत्येक कार्य पूजा है।
2. प्रश्न- स्तुति, उपसना तथा प्रार्थना का क्या अर्थ है?
उत्तर- प्रभु के अस्तित्व एवं महत्व को स्वीकार करना ही स्तुति है। प्रभु से अपनत्व का सम्बन्ध स्वीकार करना उपासना है और प्रभु प्रेम की आवश्यकता अनुभव करना प्रार्थना है।
एक अन्य प्रश्नकर्ता के उत्तर में बताया कि साधक की साध्य में अगाध प्रियता ही सच्ची उपासना है और प्रभु से नित्य एवं आत्मीय सम्बन्ध स्वीकार करने से उपासना की अभिव्यक्ति होती है।
3. प्रश्न- भजन क्या है ?
उत्तर- सेवा,त्याग और प्रेम तीनों इकट्ठे हो गये,भजन हो गया। भजन में सेवा भी है,त्याग भी है और प्रेम भी है। जब तक भगवान को अपना नहीं मानोगे,भगवान प्यारा लगेगा नहीं और जब भगवान प्यारा लगेगा नहीं तब तक उसकी याद आयेगी नहीं और जब तक याद नहीं आयेगी भजन होगा नहीं।
एक अन्य प्रश्न् के उत्तर में उन्होने स्पष्ट किया कि ''अपने में प्रीति स्वयं होती है और जिससे प्रीति होती है उसकी स्मृति भी स्वत: होती है। अत: स्वत: स्मृति का होना ही सच्चा भजन है। जब तक ममता,कामना और आसक्ति का त्याग नहीं करोगे भजन होगा ही नहीं.......''
अन्यत्र उन्होने इसी बात को इस प्रकार कहा-''है'' कि अखण्ड स्मृति ही सच्चा भजन है। अखण्ड स्मृति जिसमें पैदा होती है और जिसके प्रति होती है,दोनों के लिये रसरूप होती है।''
4.प्रश्न्- व्रत,तप प्रायश्चित व प्रार्थना का क्या अर्थ है ?
उत्तर- लक्ष्य की प्राप्ति का संकल्प व्रत है,उसमें आने वाले कष्टों को हर्षपूर्वक सहन करना तप है,की हुई भूल को न दोहराना प्रायश्चित है तथा लक्ष्य की अपूर्ति के दु:ख से दु:खी होकर व्यथित हृदय की पुकार प्रार्थना है।
जप के सम्बन्ध में स्वामी जी कहा करते थे कि तुम्हारा बेटा कहीं दूर गया है। तुम्हें प्यारा लगता है सो उसकी याद आती है। माला लेकर उसका नाम तो नहीं जपते हो। उसी प्रकार ईश्वर को अपना मानों,प्यारा लगेगा सो उसकी नित्य स्मृति स्वत: जगेगी। प्रभु स्मृति ही जप है।
5. प्रश्न- ध्यान कैसे किया जाता है? ध्यान पर बैठ जाते है पर मन लगता नहीं।
उत्तर- मैं निवेदन करता हूँ,जब तक ध्यान करेंगे तब तक ध्यान कभी होगा ही नही।...........फिर भी एक हवा बह रही है। विचार कीजिये,पानी का ध्यान,करने से आयेगा या अपने आप आयेगा? उत्तर-प्यास लगने से आयेगा। पानी के ध्यान का मूल कारण हुआ 'प्यास'। अच्छा,आपको अपने परिवार का ध्यान आता है-मूल कारण है 'अपनापन'।
तो आवश्यकता और अपनापन ध्यान का मूल है। ऑंख बन्द करके बैठना अथवा अकड़ कर बैठना ध्यान का मूल नहीं है.........।
ध्यान के सम्बन्ध में कुछ और प्रश्नोत्तर प्रस्तुत है-
प्रश्न- ध्यान क्या है ?
उत्तर- 'है' की प्रियता में डूब जाना ही सच्चा ध्यान है।
नोट:-'है' से तात्पर्य नित्य विद्यमान,आदि अन्त रहित अविनाशी तत्व जिसे हम लोग ईश्वर-प्रभु आदि कहते हैं से है।
प्रश्न- ध्यान की सिध्दि कैसे हो ?
उत्तर- अपने को सभी विषयों से हटा लेने से ही ध्यान की सिध्दि होती है।
प्रश्न- ध्यान में विध्न क्या है ?
उत्तर- व्यर्थ चिन्तन ध्यान का सबसे बड़ा विघ्न है।
6. प्रश्न - योग क्या है।
उत्तर- चित्ता का शुध्द एवं शान्त हो जाना ही योग है। दूसरों को सहयोग देने और उनके प्रति सदभावना रखने से चित्ता शुध्द होता है,और बदलें में कुछ न चाहने से शान्त हो जाता है। परिश्रम और पराश्रय को छोड़कर विश्राम और हरिआश्रय को अपनाना योगविद होने का अचूक उपाय है। अब यदि कोई कहे कि मैं हरि-आश्रय नहीं ले सकता तो वह स्व का आश्रय ले ले और निर्मम तथा निष्काम होकर राग रहित हो जाए। यदि कोई कहे कि मुझे अपनेपन का बोध नहीं है तो वह कर्तव्य में तो विश्वास कर सकता है। अपने अधिकार का त्याग और दूसरों के अधिकार की रक्षा से भी राग की निवृत्तिा होती है। राग की निवृत्ति होते ही योग की प्राप्ति स्वत: होती है।
नोट:- ऊपर परिश्रम और पराश्रय छोड़ने की बात कही गई है उसका अर्थ कोई अकर्मण्यता न समझे। मानव सेवा संघ के दर्शन में कर्तव्यपरायणता पर बहुत बल दिया गया है। यदि कर्तव्य पूरा नहीं करेंगे तो शान्ति पाही नहीं सकते।
स्वामी जी का कहना था कि योग का अर्थ होता है जुड़ना। प्रभु से,उस नित्य,अविनाशी तत्व से जुड़ना ही योग है। परन्तु आजकल तो योग के नाम पर बौध्दिक और शारीरिक जिम्नास्टिक कराया जाता है। लक्ष्य तो प्रभु मिलन है,इसलिये योग का सही अर्थ और स्वरूप समझना आवश्यक है।
प्रश्न- योग में बाधा क्या है ?
उत्तर- भोग की रूचि ही योग की सबसे बड़ी बाधा है। अब प्रश्न् आता है 'साधना' का इसके सम्बन्ध में प्रस्तर-2 में संक्षेप में उल्लेख है। इसकी विस्तार से चर्चा अलग से होगी। मात्र इतना कहना पर्याप्त होगा कि साधना शारीरधर्म नहीं है। यह स्व धर्म है।
-मानव संवा संघ दर्शन पर आधारित एवं उध्दरित
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