-: साधन सूत्र-32 :-
मानव जीवन में निवृत्ति काल का सदुपयोग
मानव जीवन में निवृत्ति काल का सदुपयोग
मानव जीवन के प्रसंग में प्रवृत्ति और निवृत्ति दो शब्द आते हैं। अपने व्यवसाय अथवा कार्यक्षेत्र से सम्बन्धित आवश्यक कर्तव्य-कर्म तथा परिवार के प्रति दायित्वों को निष्ठापूर्वक,कर्तव्य-परायणता के भाव से निबटाने को प्रवृत्ति कहते हैं। वैसे तो प्रत्येक कार्य जिसमें श्रम और पराश्रय अपेक्षित है वह प्रवृत्ति की ही श्रेणी में आता है। परन्तु आवश्यक कार्य को सही ढंग से पूरा करने के उपरान्त सहज निवृत्ति आती है जब यह महसूस होता है कि मुझे अब कुछ नहीं करना है। पर यह स्थिति तब ही आती है जब हम कार्य को निष्ठापूर्वक,मेहनत से लक्ष्य पर दृष्टि रखते हुए,निष्काम भाव से सम्पादित करते हैं। अन्यथा कार्य पूरा हो जाने के बाद भी किये हुए कर्म की,और आगे का चिन्तन बना रहता है। यह वह निवृत्ति नहीं है जिसके सदुपयोग की यहाँ चर्चा की जा रही है। वास्तव में वह निवृत्ति सही माने में हुई ही कहाँ जब हम आगे पीछे के चिन्तन में व्यस्त हैं।
यहाँ पहले चर्चा ऐसे लोगों से सम्बन्धित की जा रही है जो अब सक्रिय सेवा-काल (नौकरी आदि) से अवकाश पा चुके हैं (retired from active phase of life-service etc.)।
ऐसी आयु के अधिकांश लोगों के सामने यह समस्या होती है कि समय (निवृत्ति वाला जब सब आवश्यक कार्य पूरा कर चुके होते हैं) कैसे कटे और इसके लिए निरर्थक प्रवृत्तियों में लगे रहते हैं। उनके लिये समय बोझ स्वरूप हो जाता है। परन्तु समय तो अमूल्य है, उसे किसी प्रकार निष्प्रयोज्य कार्यों में नष्ट तो नहीं करना है। (Time is precious and it is not meant to be killed) उसका तो सदुपयोग करना है अपने जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु। लक्ष्य तो है,शान्ति,स्वाधीनता और प्रियता,दूसरे शब्दों में योग,बोध और प्रेम की प्राप्ति। आत्म-साक्षात्कार या प्रभु-मिलन (self realization-God realization) भी कह सकते हैं।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जीवन के सक्रिय चरण से अवकाश प्राप्त करने के पश्चात् समाज-सेवा,परोपकारी प्रवृत्तियों और आवश्यकतानुसार अर्थ अर्जन के लिए किसी उद्यम, व्यवसाय आदि में लगे रहते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में प्रवृत्तियों के पश्चात्,(भले ही कम अवधि के लिए) निवृत्ति की अवस्था आती ही है जब यह भाव आता है कि अब कुछ नहीं करना है। अत: जो तथ्य निवेदित हैं, वे उन पर भी वैसे ही लागू होते हैं।
जानकारी न होने से या इस बात में विश्वास न होने के कारण कि ''न करने में ही वास्तविक जीवन है", हम लोग आवश्यक कार्य सही ढंग से पूरा करने के पश्चात् जो सहज निवृत्ति होती है,उस निवृत्ति काल में कुछ भी न करके अन्दर बाहर से शान्त होकर अचिन्त की दशा प्राप्त करने के बजाय,कुछ व्यर्थ चिन्तन करते रहते हैं,या कुछ न कुछ करते रहते हैं,टी0वी0 के चैनल घुमाते रहेंगे,अखबार चाटेंगे,कोई पत्रिका उलटते-पलटते रहेंगे (सिर्फ समय काटने के लिए)।
ऐसा करने से बेहतर है भगवत् चिन्तन, भगवान की लीला कथाओं का पठन, ऐसे भजन-गीत सुनना या गाना या ऐसी creative hobbies जो हमें निजानन्द और शान्ति प्रदान करें। वे हमारे मानसिक और अध्यात्मिक स्तर को ऊपर उठायें (elevate करें) और आन्तरिक प्रसन्नता (elation) प्रदान करें।
परन्तु यह भी अखण्ड नहीं हो सकता। इनके पश्चात् भी कुछ न करने की स्थिति में आयेंगे ही क्योंकि इस प्रकार की प्रवृत्ति में क्रिया और पराश्रय होना ही है। इसलिए कुछ समय पश्चात् विराम आयेगा ही।
मानव सेवा संघ के प्रणेता ब्रह्मलीन संत स्वामी शरणानन्द जी ने 'मूक-सत्संग एवं नित्य योग' का दर्शन प्रतिपादित किया है । इस नाम की पुस्तक मानव सेवा संघ वृन्दावन से प्रकाशित है।
इस विषय की चर्चा अलग से होगी। संक्षेप में-मूक का अर्थ है अन्दर बाहर से शान्त हो जाना। सत्संग का अर्थ है सत् का संग। योग का अर्थ है जुड़ना। सत्य से जुड़ने को ही योग कहते हैं।
जब हम निवृत्ति काल में कुछ 'न करने' की स्थिति में होते हैं तब हम सत्य के संग होते हैं। अत: निवृत्ति काल में कुछ 'न करने' वाली स्थिति के लिए हमें अन्दर बाहर से शान्त हो जाना है। शरीर द्वारा कोई क्रिया नहीं और अपनी ओर से कोई चिन्तन नहीं। ऐसी दशा में अपने आप अपने मनस-पटल पर अपने किये और जो करना चाहते हैं का चित्र सिनेमा रील की भाँति आयेगा। मानव सेवा संघ दर्शन में इसे भुक्त और अभुक्त का प्रभाव कहते हैं जो उभर कर आता है। भुक्त और अभुक्त का अर्थ है जो हम भूतकाल में भोग चुके हैं या जिसे भोगना चाहते थे और नहीं भोग सके ;और भविष्य में जो करना चाहते हैं। ये दृश्य की भाँति जो अपने आप आते हैं,वे हमारे एक प्रकार से चित्र हैं।
अब यदि अपना कोई कुरूप चित्र आया तो उसका न तो विरोध करें और न ही किसी सार्थक चिन्तन द्वारा दबाने का प्रयास करें। इसी प्रकार यदि कोई सुन्दर चित्र आता है तो उसका समर्थन न करें और उसमें रस न लें। इन चित्रों का केवल इतना महत्व है कि यदि कुरूप चित्र आता है तो मानव सेवा संघ के नियम संख्या-2 के अनुसार की हुई भूल को पुन: न दोहराने क व्रत लें। हमारा वर्तमान (living present) निर्दोष होता है, अत: भूतकाल की भूलों के आधार पर अपने को दोषी न समझे और न इससे क्षुभित हों। भविष्य का कोई चित्र आता है तो मनोराज्य में लिप्त न हों,बल्कि जो आवश्यक कार्य भविष्य के लिए है उन्हें नोट कर लें, उसका प्रभाव समाप्त हो जायेगा।
सृष्टि में जो भी चीज उत्पन्न होती है उसका नाश भी होता है। इसलिए जो चित्र मानस पटल पर आते हैं वे भुक्त-अभुक्त के अंकित प्रभाव नाश होने के लिए उत्पन्न होते हैं। परन्तु हम उनका विरोध करके, उनमें रस लेकर या सार्थक चिन्तन द्वारा दबाने का प्रयास करके उन्हें सत्ता प्रदान कर देते हैं और वे बार-बार और वेग से आते हैं।
इसलिए हमें निर्लिप्त दृष्टा के रूप में मात्र असहयोग रखना है। जब हम राग और द्वेष रहित होकर निष्काम भाव से जो भी कार्य करेंगे उनके नवीन प्रभाव अंकित नहीं होंगे। पुराने अंकित प्रभावों का नाश हो जाने पर हम जब भी अन्दर बाहर से शान्त होकर बैठेंगे तो अचिन्त (thoughtlessness) की दशा और शान्ति होगी।
इसी शान्ति में विचार का उदय होता है और योग की भी प्राप्ति होती है। इस दशा में यदि रमण न करने लगे तो आगे अपने आप 'बोध' और प्रेम की प्राप्ति होगी। इन सब में रस ही रस है और रस में आनन्द ही आनन्द है। ऐसा जीवन किसे पसन्द नहीं आयेगा।
यह सारी चर्चा अवकाश प्राप्त व्यक्तियों को दृष्टि में रख कर किया गया। परन्तु यह उन लोगों के लिए भी है जो अवकाश प्राप्त नहीं है। ऐसे लोगों के भी जीवन में रोज की दिनचर्या में आवश्यक निजी,पारिवारिक और व्यवसाय/सेवा (service) सम्बन्धी आवश्यक कार्य (प्रवृत्ति) सही ढंग से पूरा करने के पश्चात्, चाहे थोड़ी ही देर के लिए सही, निवृत्ति काल आता है। कार्य के मध्य में भी यह स्थिति आती है। एक कार्य के अन्त और दूसरे कार्य के आदि- के बीच भले ही क्षणिक हो,पर निवृत्ति काल होता है। मानव सेवा संघ की सलाह है कि यदि हम इस छोटी अवधि में भी अन्दर बाहर से शान्त होने की आदत बना लें तो कार्य सम्पादन के पश्चात् थकित नहीं होंगे और कार्य कुशलता भी बढ़ जायेगी। जिस प्रकार विश्राम से पुन: शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है उसी प्रकार मानसिक रूप से शान्त हो जाने पर उसी शान्ति में सामर्थ्य की प्राप्ति होती है और विचार का उदय होता है। मानसिक शक्ति (energy) की बैटरी रिचार्ज (recharge) हो जाती है। समस्याओं और प्रश्नों का हल अपने आप निकल आता है।
अन्त में,इस सत्य में दृढ़ आस्था आवश्यक है कि कुछ न करने में ही जीवन है। शेष,करना तो सेवा और कर्तव्य पालन का ही अंग है अथवा उसी का रूप है।
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