Friday, March 4, 2011

-: साधन सूत्र-18 :-

-: साधन सूत्र-18 :-

अपने प्रति न्याय



ब्रह्मलीन संत स्वामी शरणानन्द जी के द्वारा प्रणीत मानव सेव संघ के जीवनोपयोगी ग्यारह नियमों में तीसरा नियम है:-

''विचार का प्रयोग अपने पर और विश्वास का दूसरों पर अर्थात् न्याय अपने पर और प्रेम तथा क्षमा अन्य पर''

प्रश्न् उठता है कि न्याय अपने पर का अर्थ क्या है? संतवाणी में कहा गया है कि ''न्याय का अर्थ है अपने अपराध से परिचित होना। न्याय का यह पहला अंग है। दूसरा अंग है उससे पीड़ित होना। उसका तीसरा अंग है अपराध को न करने का निर्णय करना। यह हुआ न्याय।''

''इसका फल है निर्दोषता के साथ अभिन्नता। उसका फल है जीवन का उपयोगी सिध्द होना। इस प्रकार का न्याय प्रत्येक भाई, प्रत्येक बहिन अपने साथ कर सकने में समर्थ है। .... निर्दोष जीवन में ही आवश्यक सामर्थ्य की अभिव्यक्ति होती है, निर्दोष जीवन में ही निस्सन्देहता के लिए विचार का उदय होता है और निर्दोष जीवन में ही प्रेम का प्रादुर्भाव होता है।''

व्यक्ति का ''सर्वतोमुखी विकास एक मात्र निर्दोष जीवन में ही निहित है और उसका उपाय है-की हुई भूल को न दोहराना, जानी हुई बुराई को न करना, अपने दोषों को देखना और निर्दोषता की स्थापना कर निश्चिन्त और निर्भय हो जाना।''

-ब्रह्मलीन संत स्वामी शरणानन्द जी महाराज

नोट: अभिन्नता का अर्थ है मैं और मेरी निर्दोषता का एकरूप हो जाना।



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