-: साधन सूत्र-23 :-
मनुष्य जीवन की सार्थकता-उपयोगी होना-सो कैसे हो
यह सभी को स्वीकार होगा कि मनुष्य जीवन की सार्थकता सांसारिक उपलब्धियों से नहीं सिध्द हो सकती। क्यों?क्योंकि सर्वप्रथम उसकी कोई सीमा नहीं है जिससे जीवन की सार्थकता का मापदण्ड निर्धारित हो जाय।
दूसरे सांसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करने में सब लोग समान रूप से सक्षम नहीं होते। सबकी सामर्थ्य और परिस्थिति एक जैसी नहीं होती।
इसके अतिरिक्त,कुछ ही लोग होते हैं जो प्राप्त हुआ उससे संतुष्ट हो जाते हैं और निष्ठापूर्वक अपना कर्तव्य कर्म करते रहते हैं। परन्तु काफी लोग कामना और लोभ से ग्रसित रहते हैं कि अभी और। इनमें तो कुछ स्वभाव वश इसमें उलझे रहते हैं और कुछ यह स्पष्ट न होने से कि कैसे समझें कि जीवन सार्थक हुआ।
इसीलिए मानव सेवा संघ ने कहा है कि हम अपने को उपयोगी बना लें। हम सेवा के द्वारा जगत के लिए उपयोगी होते हैं,त्याग द्वारा अथवा अचाह होकर अपने लिए उपयोगी होते हैं और प्रेमी होकर प्रभु के लिए उपयोगी होते हैं।
प्रश्न हो सकता है कि हम अपने को उपयोगी कैसे बनायें। इसके लिए मानव सेवा संघ ने बताया कि निम्नलिखित दस व्रतों को अपनाने की आवश्यकता है:-
(क) जीवन को अपने लिए उपयोगी बनाने के उपाय-
(1) निर्मम होना
(2) निष्काम होना
(3) अधिकार लोलुपता से रहित होना
(4) अहंकृति रहित होना
(ख) जीवन को जगत के लिए उपयोगी बनाने के उपाय-
(1) किसी को बुरा न समझना
(2) किसी का बुरा न चाहना
(3) किसी के प्रति बुराई न करना
नोट: यदि हम कोई स्थूल (Positive) भलाई (सेवा) नहीं कर सकते तो यह तो कर ही सकते हैं-इसमें न कोई बाधा है और न कोई असमर्थता ही है।
(ग) जीवन को प्रभु के लिए उपयोगी बनाने के उपाय-
(1) सुने हुए प्रभु की सत्ता को स्वीकार करना (अर्थात् प्रभु हैं)
(2) श्रध्दा एवं विश्वास करना।
(3) आत्मयिता का सम्बन्ध स्वीकार करना ।
इनको अपना कर अपने को उपयोगी बनाना सबको समान रूप से सहज तथा सम्भव है। इसमें अपना कल्याण और सुन्दर समाज का निर्माण निहित है।
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